
राज्य की आर्थिक रीढ़ माने जाने वाले आबकारी राजस्व पर प्रायोजित विरोध का हथौड़ा चलाने वालों के लिए अब मुश्किल वक्त शुरू हो चुका है। आबकारी आयुक्त अनुराधा पाल ने जिस तीखेपन से “जनभावनाओं” की आड़ में निजी स्वार्थ साधने वालों पर चोट की है, उसने साफ संदेश दे दिया है—सरकारी व्यवस्था अब किसी की भावनात्मक नौटंकी के दबाव में झुकने वाली नहीं।
ढालवाला की घटना को बहाना बनाकर जिस तरह वैध दुकानों पर गुस्सा उतारा गया, वह न तो जनआवाज़ थी, न सामाजिक चेतना—वह एक सधे हुए खेल का हिस्सा था। अनुराधा ने ठीक ही कहा कि यह “प्रायोजित आक्रोश” है, जो असल अपराध से ध्यान भटकाने और वैध कारोबार को नुकसान पहुंचाने के लिए रचा गया है। यह वही जमात है जो रात के अंधेरे में तस्करी का ठेका चलाती है और दिन में ‘जनहित’ के ठेकेदार बन जाती है।
सरकार को ₹200 करोड़ से अधिक का नुकसान और 41 दुकानें ठप—यह कोई जनआंदोलन नहीं, बल्कि संगठित व्यापारिक तोड़फोड़ है। आबकारी विभाग अब उस लाठी की तरह दिख रहा है जो न तो डरती है, न दबती है। अनुराधा पाल की सख्त चेतावनी यह स्पष्ट कर रही है कि “अब विरोध के नाम पर सरकारी खजाने की लूट नहीं चलेगी।”
जनभावनाओं की आड़ में तिजोरी तोड़ने वालों को अब यह समझ लेना चाहिए कि भावनाएं सरकार नहीं चलातीं, व्यवस्था चलाती है—और इस बार उस व्यवस्था की कमान एक ऐसे अफसर के हाथ में है जो फैसले करती हैं, बहाने नहीं ढूंढतीं।








