
रजत जयंती के नाम पर देहरादून में इन दिनों हर संस्थान अपनी उपलब्धियों की झलक दिखाने में लगा है, लेकिन इस भीड़ में यूपीईएस (UPES) ने सचमुच एक अलग मुकाम बना लिया है। जब ज्यादातर विश्वविद्यालय “पिछले 25 सालों की कहानी” दोहराने में मशगूल थे, यूपीईएस ने भविष्य के 25 सालों की पटकथा लिखने की ठान ली। रिसर्च, इनोवेशन और इनक्यूबेशन — तीन ऐसे शब्द जो अक्सर सरकारी रिपोर्टों में ही दम तोड़ देते हैं, वो यहां प्रयोगशाला से निकलकर हकीकत में सांस लेते दिखे।
‘विकास यात्रा ऑफ उच्च शिक्षा’ की इस प्रदर्शनी ने यह भी दिखाया कि उत्तराखंड केवल टूरिज़्म या तीर्थ का राज्य नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी और नवाचार का उभरता प्रयोगशाला प्रदेश बन सकता है। यूपीईएस के बिधोली कैंपस में एआर/वीआर से लेकर एआई और सस्टेनेबिलिटी पर जो लाइव डेमो दिखे, वो किसी मेट्रो शहर के साइंस फेयर से कम नहीं थे। यह विडंबना ही कहिए कि जहां कुछ विश्वविद्यालय अभी तक “पठन-पाठन भवन” की नींव पर ही अटके हैं, वहीं यूपीईएस ने “भविष्य के विश्वविद्यालय” की बुनियाद रख दी है।
‘उत्तराखंड हायर एजुकेशन विज़न 2050’ की घोषणा भी उसी जोश में हुई — कागज़ पर नहीं, विज़न पर। अब यह राज्य तय करेगा कि उसकी आने वाली पीढ़ियाँ सिर्फ़ डिग्री नहीं, दिशा लेकर निकलें। और इस दिशा में यूपीईएस का योगदान स्पष्ट है — यहाँ रिसर्च सिर्फ़ थीसिस का विषय नहीं, बल्कि स्टार्टअप्स और समाज के लिये समाधान बन रही है।
कुलपति डॉ. राम शर्मा की बात में एक भरोसा झलकता है — “हम अगले 25 सालों के लिये तैयार हैं।” यह कथन महज़ बयान नहीं, बल्कि एक चुनौती है उन संस्थानों के लिये जो अब भी “रैंकिंग” और “रिपोर्ट” के फेर में उलझे हैं। यूपीईएस ने यह साबित किया है कि अगर नीयत नवाचार की हो, तो पहाड़ भी प्रगति की राह पर सरक सकता है।
रजत जयंती के इस अवसर पर यूपीईएस ने उत्तराखंड को न केवल अपनी तकनीकी ताकत दिखाई, बल्कि यह भी सिखाया कि विकास समारोह में तालियां गूंजने से ज़्यादा ज़रूरी है प्रयोगशालाओं में विचारों का गूंजना। बाकी संस्थान चाहें तो इस प्रदर्शनी से नोट्स बना लें — क्योंकि भविष्य वही लिखेगा, जिसके पास विज़न होगा, और फिलहाल, वह यूपीईएस के पास है।








