
देहरादून फिर से तैयार है — इस बार स्वागत प्रधानमंत्री मोदी का होगा। और जब कमान सविन बंसल के हाथ में हो, तो “तैयारी” शब्द का मतलब ही कुछ और होता है। जिनकी कार्यशैली का ट्रैक रिकॉर्ड कहता है — “अगर मुर्मू जी दो बार बिना किसी अड़चन के देहरादून आ सकती हैं, तो पीएम मोदी के कार्यक्रम में भी धूल की एक परत तक बिना अनुमति के उड़ नहीं सकती।”
एफआरआई का वह हरा-भरा परिसर अब सिर्फ वैज्ञानिक शोध का स्थल नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुशासन की मिसाल बनने जा रहा है। जिलाधिकारी बंसल ने अपने अंदाज़ में यह साफ़ कर दिया है कि यह आयोजन केवल “समारोह” नहीं बल्कि “सिस्टम की साख” का प्रदर्शन होगा। जब वे अपनी कोर टीम के साथ मीटिंग करते हैं, तो यह महज़ चर्चा नहीं — “डिलीवरी की डेडलाइन” तय होती है।
देहरादून के अधिकारी अब जानते हैं कि जिलाधिकारी की मीटिंग में मोबाइल नहीं बजता, सिर्फ दिमाग चलता है। हर विभाग को अपनी जिम्मेदारी का रोडमैप सौंप दिया गया है — सुरक्षा से लेकर स्वच्छता तक, पार्किंग से लेकर जलपान तक — सब कुछ चेकलिस्ट पर टिक लगाते हुए आगे बढ़ रहा है।
शहर के गलियारों में चर्चा है कि अगर किसी अफसर ने ढिलाई दिखाई, तो बंसल की “एक नजर” ही काफी है काम को स्पीड देने के लिए। शायद यही वजह है कि देहरादून अब “प्रोटोकॉल सिटी” के नाम से जाना जाने लगा है।
राज्य स्थापना के रजत जयंती समारोह में जब पीएम मोदी का हेलिकॉप्टर उतरेगा, तो यह सिर्फ एक वीआईपी लैंडिंग नहीं होगी — यह सविन बंसल के प्रशासनिक कौशल की तीसरी बड़ी परीक्षा होगी। पहली बार मुर्मू जी के आगमन पर बंसल ने देहरादून को “सुरक्षा और व्यवस्था की राजधानी” बना दिया था, दूसरी बार उस स्तर को बनाए रखा गया, और अब तीसरी बार— प्रधानमंत्री की उपस्थिति में — देहरादून अपने अनुशासन और प्रशासन दोनों पर गर्व करेगा।
कह सकते हैं — इस बार देहरादून नहीं सजाया गया, इसे “प्रशासन ने तराशा” है।








