“सिस्टम मस्त, मरीज त्रस्त — दून अस्पताल से गई संवेदना, सयाना के साथ गया सुनहरा दौर”

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दून अस्पताल कभी उत्तराखंड की चिकित्सा व्यवस्था की पहचान था — एक ऐसा संस्थान जहाँ मरीजों का दर्द सुना जाता था, और समाधान खोजा जाता था। लेकिन अब वही अस्पताल बेबस, बेजान और बेहाल नज़र आ रहा है। डॉ. आशुतोष सयाना के जाने के बाद जैसे इस अस्पताल की आत्मा ही चली गई हो।

कभी यही अस्पताल अनुशासन, संवेदना और जवाबदेही का प्रतीक था। हर कर्मचारी अपने दायित्व को सेवा समझता था। डॉक्टरों में न केवल इलाज की प्रतिबद्धता थी, बल्कि मरीजों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण भी था। आज तस्वीर उलट चुकी है — अब इलाज से ज़्यादा बहाने हैं, सेवा से ज़्यादा दिखावा है। अस्पताल की दीवारें गवाह हैं कि डॉ. सयाना ने यहाँ सिर्फ मशीनें नहीं, एक मानवीय तंत्र खड़ा किया था।

सिस्टम को समझने वाले, संवाद में विश्वास रखने वाले और हर समस्या का हल मिल-जुलकर निकालने वाले डॉ. सयाना आज भले ही श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में हों, लेकिन उनका असर आज भी हर उस कर्मचारी के दिल में दर्ज है जिसने उनके साथ काम किया। वे सिर्फ एक प्राचार्य नहीं थे, एक “मार्गदर्शक” थे। जो गलतियों पर डाँटते भी थे, और मेहनती को शाबाशी भी देते थे। यही नेतृत्व की असली परिभाषा थी — जो आज अस्पताल में नदारद है।

अब हालात ऐसे हैं कि मरीजों की कराह सुनाई नहीं देती, बल्कि शिकायतों की फाइलें बढ़ती जा रही हैं। प्रशासन का ध्यान मरीजों से ज़्यादा अपने “इमेज मैनेजमेंट” पर है। मीटिंग्स समस्याओं के समाधान की जगह, पत्रकारों की निगरानी और डॉक्टरों की “लॉयल्टी टेस्ट” तक सिमट गई हैं। यानी अब इलाज सिर्फ दवाइयों से नहीं, अफसरों की मर्ज़ी से होता है।

डॉ. सयाना ने एक बार कहा था — “अस्पताल सिर्फ इमारत नहीं, यह विश्वास की बुनियाद है।” आज वह विश्वास डगमगा गया है। मरीज अब इलाज की उम्मीद लेकर नहीं, मजबूरी में यहाँ आता है। स्टाफ का मनोबल टूटा है, और अफसरों में जवाबदेही का अभाव साफ़ दिखता है।

सच तो यह है कि दून अस्पताल “बीमार” है, पर उसकी बीमारी किसी मेडिकल रिपोर्ट में नहीं मिलेगी। यह बीमारी है लापरवाही, उदासीनता और संवेदनहीनता की। डॉ. सयाना के समय लगाए गए चार चाँद अब दीमक के नीचे सड़ने लगे हैं। सिस्टम मस्त है, और मरीज त्रस्त।

हर गलियारे, हर वार्ड और हर कमरे से एक ही आवाज़ गूँजती है — “काश, सयाना सर होते… हालात ऐसे न होते।”

Khushi
Author: Khushi

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