
उत्तराखंड की रजत जयंती पर जब पूरा प्रदेश अपने दो दशक से ज़्यादा के सफ़र को याद कर रहा था, तब कोटद्वार में कुछ चेहरे थे जो इस सफ़र की स्याही में अपनी उंगलियाँ डुबो चुके थे — वे राज्य आंदोलनकारी, जिनके पसीने और आँसू से उत्तराखंड का नक़्शा बना। विधानसभा अध्यक्ष श्रीमती ऋतु खण्डूडी भूषण ने जब दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की, तो वह दीप मानो उन तमाम अनसुने नायकों की याद में जल उठा, जिन्हें इतिहास ने कई बार नोटिस लेना भूल गया।
ऋतु खण्डूडी ने कहा कि “हमारा राज्य आंदोलनकारियों के बलिदानों से बना है”— ये पंक्ति सुनते ही हॉल में बैठे कई बूढ़े चेहरों की आँखें चमक उठीं, शायद इसलिए नहीं कि यह बात नई थी, बल्कि इसलिए कि किसी सत्ताधारी ने उसे दोहराया। 25 साल बाद भी आंदोलनकारियों को सम्मान के लिए कार्यक्रम चाहिए, और समस्याओं के समाधान के लिए ‘आश्वासन’। राज्य बना जरूर, पर अब तक कई आंदोलनकारी “राज्य के फॉर्म” में ही फँसे हैं — कोई पेंशन का हक़दार बनने का इंतज़ार कर रहा है, तो कोई मुकदमे के कागज़ों में न्याय खोज रहा है।
मांगें वही हैं — “राज्य आंदोलन को शिक्षा में शामिल करो”, “जो पेंशन से वंचित हैं, उन्हें न्यूनतम सम्मान दो”, “जो मुकदमों में फँसे, उन्हें सरकारी सहायता दो”। 25 साल बाद भी अगर वही मुद्दे गूंज रहे हैं, तो ये सिर्फ़ इतिहास नहीं, बल्कि सिस्टम का ‘रीपीट टेलीकास्ट’ है। विधानसभा अध्यक्ष ने जरूर कहा कि वे इन्हें सरकार तक पहुँचाने का हरसंभव प्रयास करेंगी — बस यही शब्द “हरसंभव प्रयास” पिछले 25 वर्षों से आंदोलनकारियों की फाइलों में स्टेपल हो चुका है।
फिर भी, इस समारोह की गरिमा इस बात में थी कि वहाँ सम्मान था, सुनवाई थी, और कम से कम ‘स्मरण’ तो था। आज के राजनीतिक माहौल में जहाँ भूलना आसान है, वहाँ याद करना भी एक क्रांति है।
कार्यक्रम में नेताओं और अधिकारियों की लंबी लिस्ट थी — मानो उत्तराखंड का विकास इन्हीं की मौजूदगी से मापा जाता हो। पर असली विकास तो उस दिन होगा जब आंदोलनकारियों को सिर्फ़ मंच पर माला नहीं, बल्कि सिस्टम में जगह मिलेगी।
कुल मिलाकर, कोटद्वार का यह समारोह प्रतीक था — उस भाव का, जो कभी सड़क पर नारे बनकर गूँजा था और अब भाषणों में ‘श्रद्धा और कृतज्ञता’ के रूप में दोहराया जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब “उत्तराखंड चाहिए” की मांग थी, और अब “सम्मान मिलना चाहिए” की। फर्क वक्त का है, जज़्बे का नहीं।








