

डोईवाला से ऋषिकेश तक अचानक अफसरों में जो हलचल दिखी, उसकी वजह कोई रहस्य नहीं—बंशीधर तिवारी मैदान में उतर चुके थे। और तिवारी जब साइट पर हों तो फाइलों की धूल खुद-ब-खुद उड़ जाती है। उनका दौरा ऐसा था जैसे कोई शिक्षक अचानक क्लास में आ जाए—जिसे पढ़ाई आती है वो मुस्कुराए, और जो बहाने लेकर बैठा है वह पसीना पोंछे।
डोईवाला के आधुनिक पार्क में तिवारी ने म्यूरल्स और सेल्फी प्वाइंट की ऐसी बारीकी से जांच की कि कलाकारों को भी समझ आ गया—ये निरीक्षण है, सरसरी नज़र नहीं। देवी-देवताओं की चित्रकारी पर उनका जोर साफ था, “स्थानीय संस्कृति का सम्मान हो… और वो भी उच्च गुणवत्ता में।” मानो कह रहे हों—सजावट करोगे तो दिल से, आधा-अधूरा नहीं चलेगा।
मोक्ष धाम के निरीक्षण में उनका वह संवेदनशील लेकिन कड़क रूप दिखा, जो उन्हें एक अलग दर्जा देता है। भूमिगत संरचना से लेकर सौंदर्यकरण और सुविधाओं तक, उन्होंने जिस ध्यान से देखा, उससे ये संदेश साफ निकला—यह सिर्फ संरचना नहीं, आस्था और गरिमा का स्थान है। और यहां गलती की गुंजाइश नहीं।
ऋषिकेश की मल्टीलेवल पार्किंग और कार्यालय भवन में तिवारी की शैली पूरी ऊँचाई पर दिखी। निर्माण सामग्री पर उनकी पूछताछ, सुरक्षा मानकों की पड़ताल और साइट प्रबंधन की खामियों पर उनकी तीखी लेकिन पेशेवर टिप्पणी—सबमें एक ही बात झलकती है: उन्हें बहाना नहीं, काम चाहिए, वह भी ऐसा कि देखने वाला कहे—हाँ, यह सरकार कुछ बना रही है।
कैंप कार्यालय में बैठकर उन्होंने अधिकारियों की फाइलों की चाल समझी और सीधी चेतावनी दी—जनसुनवाई की गति बढ़ाओ, फील्ड विज़िट नियमित करो और हर रिपोर्ट समय पर मुख्यालय भेजो। उनके लहजे में व्यंग जरूर था, पर वही व्यंग सिस्टम को जगाने वाली चिंगारी भी बन गया। जैसे कह रहे हों—कुर्सी आराम के लिए नहीं, जिम्मेदारी निभाने के लिए होती है।
तिवारी की खासियत यही है—सकारात्मक ऊर्जा के साथ तंज की हल्की चुटकी, और काम में 100% ईमानदारी। वह सिर्फ निरीक्षण नहीं करते, सिस्टम की नब्ज पकड़ते हैं। जब वे निकलते हैं, तो असर सिर्फ रिपोर्ट में नहीं, जमीन पर दिखता है। यही हुनर, यही दक्षता और यही असर उन्हें एक मजबूत, काम करने वाला अधिकारी बनाता है—जिसके आने भर से विकास कार्य लाइन में आ जाते हैं।








