
खबरों से पहले यहां माहौल बनाया जाता है। और अक्सर यह माहौल काम के खिलाफ बनाया जाता है। उत्तराखंड की राजनीति को देखिए जैसे ही कोई मुख्यमंत्री व्यवस्था को पकड़ने की कोशिश करता है, वैसे ही सवाल उठने लगते हैं कि कुर्सी कितनी सुरक्षित है। सवाल काम पर नहीं होता, सवाल कुर्सी पर होता है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ भी यही हुआ। काम शुरू हुआ, फैसले दिखने लगे, प्रशासनिक तंत्र के अनुशासन की बातें होने लगीं और उसी अनुपात में अफवाहें तेज़ हो गईं। बताया जाने लगा कि सब कुछ ठीक नहीं है। लेकिन यह ‘सब’ कौन है, और ‘ठीक’ किसके हिसाब से नहीं है यह कोई नहीं बताता।
यह संयोग नहीं है कि जब-जब सरकार ने नियमों की बात की, जवाबदेही तय करने की कोशिश की, तभी-तभी नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं उभरीं। क्योंकि स्थिर सरकार सवाल पूछती है। स्थिर सरकार फाइलें खोलती है। और स्थिर सरकार कुछ लोगों के लिए असुविधाजनक हो जाती है।
धामी के कार्यकाल में एक बात साफ दिखाई देती है वे शोर से ज़्यादा काम में भरोसा करते हैं। शायद यही वजह है कि शोर मचाने वालों को बार-बार निराशा हाथ लगी। सरकार चली, फैसले हुए, और अफवाहें हर बार अपनी ही विश्वसनीयता खोती रहीं।
यहां विपक्ष से ज़्यादा भूमिका उस तंत्र की रही है, जो पर्दे के पीछे रहता है। जिसे न चुनाव लड़ना है, न जनता को जवाब देना है। लेकिन जिसे यह तय करना है कि माहौल कैसा बने। ऐसे में मुख्यमंत्री का टिके रहना, काम करते रहना अपने आप में एक राजनीतिक बयान बन जाता है।
धामी की राजनीति का एक पक्ष यह भी है कि वे टकराव से ज़्यादा संतुलन में विश्वास करते हैं। वे न हर अफवाह का जवाब देते हैं, न हर बयान पर प्रतिक्रिया। शायद उन्हें पता है कि सरकारें प्रेस नोट से नहीं, निर्णय से चलती हैं।
बार-बार यह दिखाने की कोशिश की गई कि सरकार अस्थिर है। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह रही कि प्रशासन चलता रहा। योजनाएं आगे बढ़ीं। और जो लोग रोज़ सरकार गिरने की तारीखें तय कर रहे थे, वे खुद सवालों के घेरे में आते चले गए।
आज सवाल यह नहीं है कि मुख्यमंत्री कितने सुरक्षित हैं। सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड को एक ऐसे नेतृत्व को काम करने दिया जाएगा, जो बिना शोर किए फैसले लेना चाहता है। क्या हर बार वही पुरानी राजनीति दोहराई जाएगी, जिसमें काम से ज़्यादा कुर्सी की चर्चा होती है?
धामी का टिके रहना सिर्फ एक व्यक्ति का टिके रहना नहीं है। यह उस सोच का टिके रहना है कि उत्तराखंड को स्थिरता की ज़रूरत है। बार-बार नेतृत्व बदलने की नहीं। अगर यह राज्य आगे बढ़ना चाहता है, तो उसे अफवाहों से नहीं, काम से सरकार को परखना होगा।








