
देहरादुन: नई दिल्ली में हुई यह शिष्टाचार भेंट औपचारिकता भर नहीं थी, बल्कि उत्तराखंड की पहचान, उसकी जड़ों और उसकी रीढ़—तीनों का सधा हुआ प्रस्तुतीकरण थी। सत्ता के गलियारों में अक्सर मुलाक़ातें होती हैं, पर कुछ मुलाक़ातें राज्य की आत्मा को साथ लेकर चलती हैं। ऋतु खण्डूडी भूषण ने वही किया।
रम्माण जैसे लोकनाट्य पर आधारित पुस्तक भेंट करना कोई सांस्कृतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि यह याद दिलाने का तरीका था कि उत्तराखंड केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि परंपरा, लोकबोध और जीवित संस्कृति का प्रदेश है। जब बात लोकनाट्य की हो और श्रोता देश का रक्षा मंत्री हो, तो संदेश साफ़ होता है—यह भूमि सिर्फ़ मंच की नहीं, मोर्चे की भी उतनी ही परिचित है।
पिताश्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूडी का कुशलक्षेम पूछा जाना और देहरादून आने की इच्छा जताना भी सामान्य संवाद नहीं था। यह उस पीढ़ी के प्रति सम्मान था, जिसने वर्दी और मूल्यों—दोनों को समान निष्ठा से निभाया। यह संकेत भी कि राजनीति जब विरासत से जुड़ती है, तो उसका वजन अपने आप बढ़ जाता है।
कोटद्वार का उल्लेख, उसकी सैन्य पृष्ठभूमि और देशसेवा से जुड़े नागरिकों की बहुलता का जिक्र दरअसल उस सच्चाई की ओर इशारा था, जिसे अक्सर आंकड़ों में दबा दिया जाता है—कि सीमांत प्रदेशों का योगदान सिर्फ़ नक्शे पर नहीं, राष्ट्र की रक्षा में भी निर्णायक होता है। आमंत्रण महज़ एक निमंत्रण नहीं, बल्कि उस भरोसे की अभिव्यक्ति था कि यह भूमि नेतृत्व को केवल सम्मान नहीं, दृष्टि भी देती है।
इस पूरी भेंट में न कोई शोर था, न आत्मप्रचार। पर संदेश स्पष्ट था—उत्तराखंड की संस्कृति, सैन्य परंपरा और जनभावना को समझने के लिए लंबी घोषणाओं की नहीं, संवेदनशील संवाद की ज़रूरत होती है। शायद यही वजह है कि कुछ मुलाक़ातें ख़बर बनती हैं और कुछ इतिहास की पंक्ति में दर्ज हो जाती हैं।








