
इन दिनों राज्य में एक माहौल बनाए जाने का प्रयास है या कहें कि एक सुनियोजित प्रयोग चल रहा है। अपराध के खिलाफ कठोर कार्रवाई को निजी स्वार्थ की आड़ में सवालों के घेरे में लाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि अपराध पर धामी सरकार की नीति बिल्कुल साफ है: शून्य सहनशीलता। खासकर दिवंगत बेटी के न्याय के प्रश्न पर सरकार एक इंच भी पीछे हटने वाली नहीं है, न पहले हटी और न आगे हटेगी।
सरकार ने यह साबित किया है कि नाम, रसूख और दबाव उसके लिए मायने नहीं रखते। जांच एजेंसियां कानून के मुताबिक चलीं, अदालत में तथ्य रखे गए और दोषियों को सजा दिलाने की प्रक्रिया को तार्किक अंजाम तक पहुंचाया गया। यही वजह है कि आज जब कुछ लोग निजी हित साधने के लिए पुराने घावों को कुरेदकर सरकार को कटघरे में खड़ा करना चाहते हैं, तो उनकी मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। न्याय की लड़ाई भावनात्मक उन्माद से नहीं, संवैधानिक प्रक्रिया से लड़ी जाती है।
यह भी गौर करने योग्य है कि जब मामला अपने चरम पर था, तब जिनके पास कथित तौर पर बहुत कुछ था, वे खामोश रहे। आज अचानक उनका मुखर होना यह संकेत देता है कि उद्देश्य न्याय नहीं, दबाव बनाना है। निजी टकराव को सार्वजनिक आक्रोश में बदलकर सरकार को अस्थिर करने का यह तरीका न तो नैतिक है और न ही स्वीकार्य। ऐसे प्रयासों से न पीड़ित को लाभ होता है, न समाज को केवल अविश्वास और अराजकता को खाद मिलती है।
धामी सरकार ने अपराधियों के प्रति जो सख्त रुख अपनाया है, उसने कई असहज सच्चाइयों को सामने ला दिया है। यही सख्ती कुछ लोगों को चुभ रही है। इसलिए अब साजिशों का सहारा लिया जा रहा है कभी भावनाओं को भड़काकर, कभी व्यवस्था पर सवाल खड़े करके। लेकिन यह रणनीति ज्यादा दूर तक नहीं चलेगी। राज्य की जनता देख रही है कि कौन न्याय की बात कर रहा है और कौन न्याय की आड़ में अपना हिसाब बराबर करना चाहता है।
सरकार को टारगेट करना आसान है, लेकिन कानून से बच पाना मुश्किल। निजी स्वार्थ साधने के लिए राज्य के माहौल को बिगाड़ने की कोशिशें पहले भी नाकाम हुई हैं और आगे भी होंगी। क्योंकि यहां फैसला सड़कों के शोर से नहीं, अदालत के सबूतों से होता है। और जब सरकार खुद न्याय की प्रक्रिया के साथ मजबूती से खड़ी हो, तो किसी भी षड्यंत्र की उम्र लंबी नहीं होती है








