
वाह बुआ, वाह! क्या टाइमिंग है चार बरस तक मौन व्रत, और अचानक न्याय की घंटी बज उठी। सच में, इतनी साधना के बाद जो आवाज़ निकली है, वह माइक नहीं मांगती, मेगाफोन खुद चलकर आता है। जब पूरा प्रदेश एक बेटी के लिए सच ढूंढ रहा था, तब आपकी जुबान पर दही इतनी मजबूती से जमी थी कि फ्रीज़र भी शर्मा जाए। तब न अदालत याद आई, न सबूत, न संवेदना बस खामोशी थी, गहरी और सुविधाजनक।
आज निजी हिसाब बराबर करने का मौसम आया तो याददाश्त भी लौट आई। आरोपों की फाइल खुली, भावनाओं का सैलाब आया, और सड़कें मंच बन गईं। वाह बुआ, निजी झगड़े को सार्वजनिक आग में बदलने की कला कोई आपसे सीखे। भीड़ भड़काओ, माहौल गरमाओ, और फिर व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दो न्याय ऐसे ही मिलता है न?
कानून बेचारा फिर से वही पुराना सवाल पूछ रहा है सबूत? लेकिन बुआ, सबूत तो शोर में दब जाते हैं, है न? अदालत में बोलने से पहले कैमरे पर बोलना ज्यादा असरदार लगता है। चार साल पहले अगर ये साहस था, तो तब क्यों नहीं निकला? तब क्यों नहीं कहा कि “मेरे पास यह है, यह देखिए”? शायद तब स्क्रिप्ट तैयार नहीं थी, या शायद तब मामला निजी नहीं बना था।
और यह भी कमाल है कि हर बार आग लगती है तो माचिस किसी और के हाथ में दिखती है। खुद की जिम्मेदारी? अरे छोड़िए! भीड़ उतरे, पत्थर चलें, प्रदेश जले बस आपकी बात सुनी जाए। यह न्याय नहीं, यह तमाशा है; और तमाशे में सच अक्सर सबसे पहले कुचला जाता है।
नैतिकता की दुकान भी गजब चल रही है जहां दोष हमेशा सामने वाले का और पवित्रता का प्रमाण खुद का। लेकिन बुआ, आईना बड़ा जिद्दी होता है। गलत अगर गलत है तो हर तरफ से गलत है; और देर से, सुविधा से, शोर के साथ निकाला गया सच सच कम, रणनीति ज्यादा लगता है।
सरकार को कोसना फैशन है, पर कानून को बचाना जिम्मेदारी। न्याय सड़कों पर नहीं, फाइलों में तय होता है। चीखें इतिहास नहीं बनतीं, सबूत बनते हैं। वाह बुआ, वाह इतना ही साहस पहले दिखा देतीं, तो शायद आज यह शोर नहीं, फैसला बोल रहा होता।








