नारी सम्मान पर कालनेमि प्रहार, कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या के पति की सौदेबाज़ी ने घटिया सोच को किया बेनकाब

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जो अंत तक निभाने योग्य न हो, उसका उभरना ही व्यर्थ होता है कालनेमि की तरह, जिसने साधु का वेश धरकर अधर्म का मार्ग चुना। आज वही कालनेमि प्रवृत्ति सत्ता के आसपास दिखाई देती है, जब कैबिनेट मंत्री के पति गिरधारी लाल साहू मंच से महिलाओं को सौदे की वस्तु बताने जैसा शर्मनाक बयान देते हैं। मस्तक पर धार्मिक चिह्न और मुख से अपमानजनक शब्द यह विरोधाभास नहीं, पाखंड की पहचान है।
यह सिर्फ़ बिहार की महिलाओं का अपमान नहीं है, यह पूरे नारी समाज को नीचा दिखाने की कोशिश है। माँ-बहनों ने सदियों से त्याग, तप और बलिदान देकर परिवार और समाज को सँभाला है, और बदले में उन्हें दाम से तौलने की भाषा सुनने को मिले—यह सोच जितनी घटिया है, उतनी ही खतरनाक भी। ऐसे बयान यह साफ़ करते हैं कि कुछ लोग संस्कृति और संस्कार को भाषणों तक सीमित रखते हैं, व्यवहार में उनकी आत्मा खोखली होती है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जब सत्ता से जुड़े लोग इस तरह की मानसिकता का प्रदर्शन करते हैं, तो उसका सामाजिक संदेश क्या जाता है? आम आदमी यही समझता है कि ताक़त के पास बैठे लोगों को बोलने की छूट है, जवाबदेही नहीं। यही कारण है कि ऐसी जुबानें बेलगाम होती जा रही हैं। यह मामला किसी निजी व्यक्ति का नहीं रह जाता, क्योंकि मंत्री के पति होना अपने आप में सार्वजनिक जिम्मेदारी ले आता है।
धामी सरकार ने अब तक कई अवसरों पर सख़्त प्रशासनिक और नैतिक निर्णय लेकर एक स्पष्ट संदेश दिया है। ऐसे में इस प्रकरण पर चुप्पी सरकार की उसी छवि को कमजोर करती है। अगर महिलाओं के सम्मान और गरिमा की बात सच में प्राथमिकता है, तो फिर ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई भी दिखनी चाहिए। वरना “नारी सम्मान” सिर्फ़ नारा बनकर रह जाएगा और कालनेमि प्रवृत्ति वाले लोग धार्मिक प्रतीकों की आड़ में समाज को विष परोसते रहेंगे।
यह वक्त है कि सरकार स्पष्ट करे सत्ता की परिधि में खड़े होकर महिलाओं की सौदेबाज़ी करने वालों के लिए कोई जगह नहीं है। वरना इतिहास गवाह है, कालनेमि जैसे चरित्र अंततः बेनकाब होते हैं, और उनकी पहचान पाखंड के अलावा कुछ नहीं बचती।

Khushi
Author: Khushi

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