
यह फैसला किसी एक पटवारी के खिलाफ नहीं, बल्कि उस मानसिकता के खिलाफ है जो सरकारी पद को “कमाई का लाइसेंस” समझ बैठी थी। शिकायत आई, साक्ष्य आए और कार्रवाई हुई बिना देर, बिना दबाव, बिना लीपापोती। यहीं से पहचान बनती है डीएम सविन बंसल जैसे अधिकारियों की, जिनके लिए फाइल नहीं, जनता प्राथमिकता होती है।
लाखामण्डल जैसे क्षेत्र में अवैध वसूली सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि गरीब, किसान और जनजातीय समाज पर सीधा अत्याचार है। वर्षों से चली आ रही “दे दो–काम लो” की संस्कृति पर अगर कोई कड़ाई से हाथ डालता है, तो स्वाभाविक है कि सिस्टम में बैठे कुछ लोग असहज हों। लेकिन प्रशासन का काम असहजता से डरना नहीं, अन्याय पर प्रहार करना है और यही इस कार्रवाई में साफ दिखाई देता है।
ऑडियो साक्ष्य के आधार पर त्वरित निलंबन यह बताने के लिए काफी है कि अब बहानों का समय खत्म हो चुका है। न लंबी प्रतीक्षा, न जांच के नाम पर टालमटोल। स्पष्ट संदेश है यदि सबूत हैं, तो कार्रवाई तय है। यह वही दृढ़ता है जो जनता वर्षों से प्रशासन में ढूंढती रही है।
तंज यही है कि जो खुद को कानून से ऊपर समझ रहे थे, उन्हें अब कानून का मतलब समझाया जा रहा है। जिनके हाथ में सरकारी मुहर थी, वही अब जवाबदेही की मुहर में बंद हैं। यह कार्रवाई दूसरों के लिए चेतावनी है और आम आदमी के लिए सुकून।
डीएम सविन बंसल का यह रुख साबित करता है कि प्रशासन जब इच्छाशक्ति दिखाता है, तो भ्रष्टाचार खुद-ब-खुद बौना हो जाता है। नर्मी जहां जरूरी हो, वहां नर्मी; और जहां जनहित से खिलवाड़ हो, वहां कठोरता यही संतुलन एक मजबूत जिलाधिकारी की पहचान है। ऐसे ही होते हैं जनता के डीएम कड़क, स्पष्ट और त्वरित, जिनसे व्यवस्था भी डरती है और जनता भरोसा करती है।








