धामी की दृढ़ इच्छाशक्ति से घबराया विपक्ष,कांग्रेस भवन में विलाप,अर्थी की राजनीति और हताशा का प्रदर्शन

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कांग्रेस भवन के अंदर आज ऐसा मातम पसरा था मानो किसी बड़े कांग्रेसी नेता का दुखद निधन हो गया हो। रोने की आवाज़ें, विलाप, हाथ-पैर पीटना, ज़मीन पर बैठकर छाती कूटना सब कुछ इतना जीवंत कि पल भर को लगा शोकसभा चल रही है। उत्सुकतावश पास जाकर देखा तो हतप्रभ रह गया। न कोई नेता दिवंगत हुआ था, न कोई त्रासदी घटी थी। बीच में पुतला-नुमा अर्थी रखी थी और उस पर नाम था मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का।
दृश्य अजीब था, बल्कि हास्यास्पद और चिंताजनक दोनों। लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए मुख्यमंत्री की अर्थी बनाकर उसके सामने बैठकर रोना ये कैसा आंदोलन है? किस बात का शोक मनाया जा रहा है? सत्ता न मिलने का? जनता के भरोसे के खत्म होने का? या फिर उस राजनीति के अंतिम संस्कार का, जो कभी मुद्दों पर चला करती थी?
विलाप करते चेहरे बता रहे थे कि ये दुख किसी नीति के विफल होने का नहीं, बल्कि रणनीति के दिवालिया हो जाने का है। रडाक मार-मारकर रोने वाले दरअसल अपनी ही राजनीतिक प्रासंगिकता का मातम मना रहे थे। गमगीन दिखने की कोशिश में जो नाटक हो रहा था, वो करुणा नहीं, कुंठा का प्रदर्शन था। ऐसा लग रहा था जैसे तर्क मर गया हो, विचार थक गया हो और अब बस अभिनय बचा हो।
ये वही पार्टी है जो कभी वैचारिक बहस की बात करती थी, आज पुतलों के सहारे अपनी पीड़ा व्यक्त कर रही है। सवाल ये नहीं कि अर्थी किसकी बनाई गई, सवाल ये है कि राजनीति को किस दिशा में ले जाया जा रहा है। जब विरोध का स्तर इतना गिर जाए कि रोना ही हथियार बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि मुद्दे साथ छोड़ चुके हैं।
मुख्यमंत्री धामी अपनी कुर्सी पर काम कर रहे हैं निर्णय ले रहे हैं, ज़मीन पर उतरकर शासन चला रहे हैं। और इधर विपक्ष अर्थी के सामने बैठकर विलाप कर रहा है। एक तरफ़ शासन है, दूसरी तरफ़ श्मशान-राजनीति। फर्क साफ़ है।
इस दृश्य को देखकर यही सवाल मन में गूंजता रहा ये कैसा आंदोलन है, जिसमें न मांग है, न दिशा, न गरिमा? शायद कांग्रेस आज उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ संघर्ष नहीं बचा, सिर्फ़ मातम रह गया है। और जब राजनीति रोने लगे, तो समझ लीजिए जनता उसे सुनना बंद कर चुकी है।

Khushi
Author: Khushi

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