

देहरादुन,उत्तराखण्ड में यदि शासन-प्रशासन को मानवीय संवेदना, दृढ़ इच्छाशक्ति और परिणाम देने वाली कार्यशैली का चेहरा देखना हो, तो धाकड़ धामी के धाकड़ डीएम सविन बंसल उस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते दिखाई देते हैं। बेटियों के भविष्य के सवाल पर न फाइलों का बोझ, न नियमों की आड़ सीधे निर्णय, साफ नीयत और ज़मीन पर असर। यही वजह है कि सविन बंसल आज केवल एक जिलाधिकारी नहीं, बल्कि संकट में फंसी बेटियों के लिए मील का पत्थर साबित हो रहे हैं।
जहाँ एक तरफ़ तमाम योजनाएँ काग़ज़ों में दम तोड़ देती हैं, वहीं नंदा-सुनंदा जैसे प्रयासों के ज़रिये शिक्षा को सिर्फ़ “सहायता” नहीं, बल्कि “पुनर्जीवन” दिया जा रहा है। सीएसआर फंड का उपयोग दिखावे के लिए नहीं, बल्कि सही पात्र तक, सही समय पर पहुँचाना—यही प्रशासनिक संवेदनशीलता की असली पहचान है। आईसीयू में पड़े पिता की चिंता के बीच सीए बनने का सपना देखती जीविका हो या आर्थिक अभावों से जूझते हुए डॉक्टर बनने का संकल्प लिए नंदिनी—इन दोनों कहानियों में एक साझा सूत्र है: प्रशासन का मजबूत कंधा।
यह पहल बताती है कि बेटियों के हक़ में निर्णय केवल भाषणों से नहीं, बल्कि साहसिक प्रशासनिक फैसलों से लिए जाते हैं। धामी के नेतृत्व में सविन बंसल जैसे अधिकारी यह साबित कर रहे हैं कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो व्यवस्था बोझ नहीं, बल्कि उम्मीद बन सकती है। यही सुशासन का असली अर्थ है—जहाँ बेटियों की शिक्षा की ‘स्पार्क’ बुझने नहीं दी जाती, बल्कि उसे भविष्य की रोशनी में बदल दिया जाता है।








