चिकित्सक का सम्मान ही राष्ट्र का सम्मान, सेवा, साधना और संघ की राष्ट्रदृष्टि का सशक्त संदेश

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देहरादून में स्वामी विवेकानंद की 162वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम ने चिकित्सा, सेवा और राष्ट्रबोध को एक ही सूत्र में बांध दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह आलोक कुमार का वक्तव्य केवल स्वास्थ्य व्यवस्था पर टिप्पणी नहीं था, बल्कि भारतीय दृष्टि से “सेवा को साधना” और “चिकित्सक को राष्ट्रनिर्माता” के रूप में स्थापित करने का वैचारिक उद्घोष था। उनका यह कथन कि “चिकित्सक का सम्मान भारत का सम्मान है” दरअसल संघ की उस सोच को रेखांकित करता है, जिसमें व्यक्ति नहीं, व्यवस्था और मूल्य केंद्र में होते हैं।
आलोक कुमार ने प्राचीन भारतीय परंपरा की याद दिलाते हुए कहा कि वैद्य सेवा को धर्म मानते थे, लाभ नहीं। आज परिस्थितियाँ बदली हैं, लेकिन समाधान पश्चिमी मॉडल की नकल में नहीं, बल्कि सरकार और सामाजिक संगठनों की साझी जिम्मेदारी में है। यही संघ की मूल कार्यशैली है—जहाँ राज्य और समाज टकराते नहीं, पूरक बनते हैं। स्वामी विवेकानंद हेल्थ मिशन द्वारा सीमित संसाधनों में 15 अस्पतालों का निर्माण इसी विचार की जीवंत मिसाल है।
जूना अखाड़े के आचार्य महामंडेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज ने करुणा, जिजीविषा और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को चिकित्सा से जोड़ते हुए स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य केवल शरीर का विषय नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों का विस्तार है। उनका यह कहना कि आज वेलनेस और ब्यूटी पर खर्च बढ़ा है, लेकिन करुणा पर नहीं—समकालीन समाज पर सीधा और सटीक प्रहार है। चिकित्सक को “भगवान श्रीहरि का रूप” बताना केवल भावुक वक्तव्य नहीं, बल्कि सेवा को सर्वोच्च साधना मानने वाली भारतीय दृष्टि का उद्घोष है।
कार्यक्रम में आरएसएस, संत समाज, सरकार और सामाजिक संस्था—चारों की उपस्थिति यह संकेत देती है कि जब उद्देश्य राष्ट्र और मानव कल्याण हो, तो वैचारिक धरातल एक हो जाता है। कृषि मंत्री गणेश जोशी की मौजूदगी और सोसाइटी के कर्मठ योद्धाओं का सम्मान इस बात का प्रमाण है कि सेवा कार्य केवल मंचीय प्रशंसा नहीं, बल्कि निरंतर कर्म और अनुशासन से आगे बढ़ता है।
समग्र रूप से यह आयोजन किसी एक संस्था या व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस विचारधारा का प्रतिबिंब था जिसमें चिकित्सा सेवा, सामाजिक समरसता और राष्ट्रनिर्माण एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। यही संघ की ताकत है—शब्दों से ज्यादा कर्म, और कर्म के पीछे स्पष्ट राष्ट्र

Khushi
Author: Khushi

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