
सिटी फॉरेस्ट पार्क को लेकर एमडीडीए की यह पूरी कार्रवाई दरअसल उस प्रशासनिक रवैये पर सीधा कटाक्ष है, जहां हरियाली को पोस्टर और स्लोगन तक सीमित कर दिया गया है। आजकल पर्यावरण संरक्षण की बातें खूब होती हैं, मगर ज़मीन पर नज़र कम ही जाती है। ऐसे माहौल में जब कोई अधिकारी खुद मौके पर जाकर हालात देखता है और सीधे-सीधे काम की बात करता है, तो वह अपने आप में एक संदेश होता है। बंशीधर तिवारी का तरीका यही है कम बोलो, ज्यादा देखो और उससे भी ज्यादा करवाओ।
कर्मचारियों के आई-कार्ड और बायोमैट्रिक उपस्थिति जैसी व्यवस्थाएं सुनने में साधारण लग सकती हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि सिस्टम की सबसे बड़ी बीमारी यहीं से शुरू होती है। कौन काम पर है, कौन सिर्फ रजिस्टर में मौजूद है इस फर्क को साफ करना अपने आप में आधा सुधार है। तिवारी ने कोई बड़ा भाषण नहीं दिया, बस इतना कहा कि जो जिम्मेदारी ले रहा है, वह सामने भी दिखे। यही देशी अंदाज का प्रशासन है सीधी बात, बिना घुमा-फिरा कर।
सुरक्षा को लेकर भी सोच बिल्कुल साफ है। पार्क दिन में घूमने की जगह है तो रात में भी उसकी जिम्मेदारी उतनी ही है। अतिरिक्त सुरक्षा कर्मी हों, आख़िरी छोर पर सिक्योरिटी हट हो या फिर सीसीटीवी से हर कोने की निगरानी यह सब उस सोच का नतीजा है जिसमें घटना के बाद अफसोस नहीं, बल्कि घटना से पहले इंतज़ाम किया जाता है। मज़े की बात यह है कि जैसे ही निगरानी की बात आती है, लापरवाही अपने आप लाइन में आ जाती है।
सबसे ठोस और सबसे सख्त फैसला वह है, जिसमें सिटी फॉरेस्ट पार्क को कंक्रीट से दूर रखने की बात कही गई है। आजकल विकास का मतलब कई जगह पेड़ों के बीच इमारतें खड़ी करना हो गया है। ऐसे में यह फैसला उन सब योजनाओं पर एक शांत लेकिन तीखा तंज है, जो हर खाली जगह को सीमेंट से भर देना चाहती हैं। तिवारी ने साफ कर दिया कि जंगल का काम जंगल रहना है, उसे शहर बनाने की ज़िद यहां नहीं चलेगी।
आपातकालीन नंबर, अग्निशमन व्यवस्था और स्टॉक रजिस्टर जैसे मुद्दे सुनने में भले ही फाइलों की भाषा लगें, लेकिन यही वे चीजें हैं जो किसी व्यवस्था की असली परीक्षा होती हैं। जब कोई अधिकारी इन बुनियादी बातों को दुरुस्त करता है, तो समझ लेना चाहिए कि वह सिर्फ निरीक्षण नहीं कर रहा, बल्कि सिस्टम को कस रहा है।
कुल मिलाकर सिटी फॉरेस्ट पार्क का मामला यह दिखाता है कि बंशीधर तिवारी किस तरह का अफसर है। न बहुत दिखावा, न खोखले वादे। धरातल पर रहकर काम देखने की आदत और गलतियों को वहीं पकड़ने का मिज़ाज—इसी वजह से विकास कार्यों में तिवारी का डंका बजता है। यह संपादकीय किसी तारीफ की मजबूरी नहीं, बल्कि उस हकीकत का बयान है कि जब अफसर काम करने वाला हो, तो व्यवस्था अपने आप बोलने लगती है।








