राष्ट्रीय जिम्मेदारी या निजी अहं, जब संगठन का पक्ष परदे के पीछे दब जाए

SHARE:

देहरादून, किसी भी संगठित लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रीय जिम्मेदारी का अर्थ केवल पद धारण करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक मंच पर संगठन का पक्ष मजबूती से रखना होता है। सिस्टम यह अपेक्षा करता है कि जिसे मीडिया जैसी संवेदनशील जिम्मेदारी सौंपी गई है, वह सवालों से भागे नहीं, डिबेट में बैठे, तर्क दे और पार्टी फोरम की बात राष्ट्रीय स्तर पर निर्भीकता से रखे। लेकिन जब जिम्मेदारी निभाने की जगह चुप्पी ओढ़ ली जाए और परदे के पीछे रहकर मीडिया को संचालित किया जाए, तो यह भूमिका नहीं, पलायन कहलाता है।
यही से असल सवाल जन्म लेता है। आज तक राष्ट्रीय स्तर की मीडिया डिबेट में पार्टी का पक्ष रखते हुए ऐसी कोई ठोस उपस्थिति दिखाई नहीं देती, जहाँ खुलकर विचार रखे गए हों। इसके उलट, मीडिया का इस्तेमाल एक औज़ार की तरह होता दिखता है—बिना सामने आए, बिना जवाबदेही लिए। मतलब साफ है, डिबेट में बैठकर संगठन का पक्ष रखना नहीं, बल्कि मीडिया को दूर से नियंत्रित कर निजी लड़ाइयों में झोंक देना ही रणनीति बन गई है।
यहीं से वह सोच उभरती है जो संगठन से बड़ी होकर खुद को अजेय मानने लगती है। जिस पद की जिम्मेदारी देशभर के नैरेटिव को संतुलित करने की हो, अगर वहां निजी कुंठा, व्यक्तिगत अदावत और सत्ता-संघर्ष हावी हो जाए, तो नुकसान सिर्फ किसी मुख्यमंत्री या किसी राज्य का नहीं होता। उसका असर पूरे संगठन और देश की छवि पर पड़ता है। मीडिया कोई तलवार नहीं है जिसे निजी लड़ाई में भांजा जाए; वह संवाद का माध्यम है, दिशा देने का औजार है। लेकिन जब वही मीडिया बदले की भावना से चलाया जाए, जब खबरें नहीं बल्कि हिसाब-किताब परोसे जाएं, तो उसका प्रभाव सीमाओं में नहीं रुकता। देश देखता है, दुनिया देखती है, और देवभूमि जैसे संवेदनशील राज्य के बारे में जो संदेश जाता है, वह बेहद खतरनाक होता है।
अगर किसी मुख्यमंत्री से मतभेद हैं, तो संगठन के भीतर संवाद का रास्ता होता है। लेकिन अगर “36 का आंकड़ा” बनाकर हर मोर्चे पर हमला ही रणनीति बन जाए, तो यह राजनीति नहीं, आत्मघाती जिद बन जाती है। इससे न सरकार मजबूत होती है, न संगठन बस शोर बढ़ता है और भरोसा घटता है। बहस में बैठने का साहस न हो, लेकिन बहस की दिशा तय करने का अहं जरूर हो, तो यह जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं, उसका दुरुपयोग है।
विडंबना यह है कि यह रवैया किसी एक राज्य तक सीमित नहीं दिखता। अलग-अलग राज्यों में वही पैटर्न, वही भाषा, वही एजेंडा। कहीं उत्तर प्रदेश, कहीं मध्यप्रदेश हर जगह संगठन से ज्यादा व्यक्ति केंद्र में नजर आता है। मानो पार्टी कोई वैचारिक संस्था नहीं, बल्कि निजी युद्ध का मंच बन गई हो।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में संगठन को ही ताक पर रख दिया गया है। जिन कार्यकर्ताओं ने जमीन सींची, जिन लोगों ने विश्वास दिया, उनकी मेहनत को मीडिया के ज़रिये दांव पर लगाया जा रहा है। यह तरीका किसी को क्षणिक संतोष दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह उसी दल को भीतर से खोखला करता है जिसके नाम पर यह सब किया जा रहा है।
देवभूमि कोई प्रयोगशाला नहीं है और न ही मीडिया कोई निजी हथियार। राष्ट्रीय जिम्मेदारी का अर्थ है सामने आकर संगठन का पक्ष रखना, सवालों का सामना करना और विचार को मजबूती से रखना। जिम्मेदारी बड़े पद से नहीं, बड़ी सोच से निभाई जाती है। इतिहास गवाह है जो लोग संगठन से ऊपर खुद को रखते हैं, वे अंततः न संगठन के रहते हैं, न इतिहास के सम्मानित पन्नों में।

Khushi
Author: Khushi

Leave a Comment

सबसे ज्यादा पड़ गई