उत्तरायणी कौथिक महोत्सव, गीता धामी की समाजसेवा, संस्कृति और उत्तराखंडियत का जीवंत संकल्प

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माघ पूर्णिमा जैसे पावन पर्व पर उत्तरायणी कौथिक महोत्सव की तैयारियों का शुभारंभ अपने आप में यह दर्शाता है कि यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामाजिक दायित्व का समन्वित प्रयास है। गीता धामी द्वारा विधि-विधान से किया गया पूजन उत्तराखंड की उस मूल चेतना को दर्शाता है, जहाँ हर शुभ कार्य प्रकृति, संस्कृति और लोकविश्वास से जुड़कर ही पूर्ण होता है। यह भाव ही उत्तराखंडियत की असली पहचान है,सादगी, श्रद्धा और सामूहिक मंगलकामना।
पूजन के उपरांत वृक्षारोपण कर गीता धामी ने यह स्पष्ट किया कि उनके लिए संस्कृति केवल मंचीय प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ विषय है। आज जब विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन एक बड़ी चुनौती है, ऐसे में उनका यह संदेश उन्हें एक संवेदनशील समाज सेविका के रूप में स्थापित करता है, जो परंपरा और आधुनिक जिम्मेदारियों दोनों को समान महत्व देती हैं।
सेवा संकल्प फाउंडेशन के माध्यम से उत्तरायणी कौथिक महोत्सव की तैयारियों की गहन समीक्षा और जनसरोकारों से जोड़ने का प्रयास यह दर्शाता है कि यह आयोजन दिखावे का नहीं, बल्कि सहभागिता का उत्सव होगा। स्थानीय कलाकारों, लोककलाओं और पारंपरिक विधाओं को सशक्त मंच देना गीता धामी की उस सोच को उजागर करता है, जिसमें जमीनी प्रतिभाओं को पहचान और सम्मान देना सर्वोपरि है। यह दृष्टिकोण उन्हें केवल आयोजक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण की वाहक बनाता है।
महोत्सव में उत्तराखंड की लोकसंस्कृति के साथ-साथ देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर उत्तर-पूर्वी भारत की जनजातीय संस्कृतियों को मंच देने का निर्णय गीता धामी की व्यापक और समावेशी सोच को दर्शाता है। यह पहल उत्तराखंड की पहचान को और अधिक सशक्त बनाती है,एक ऐसा उत्तराखंड जो अपनी जड़ों पर गर्व करता है, लेकिन देश की विविध संस्कृतियों को गले लगाने की क्षमता भी रखता है। यही उत्तराखंडियत की आत्मा है,विविधता में सामंजस्य और परंपरा में प्रगतिशील दृष्टि।
कुल मिलाकर, उत्तरायणी कौथिक महोत्सव गीता धामी की सामाजिक और सांस्कृतिक छाप को बड़े पैमाने पर रेखांकित करता है। यह आयोजन उनकी उस भूमिका को मजबूत करता है, जहाँ सेवा, संस्कृति, पर्यावरण और समाज एक-दूसरे के पूरक बनते हैं। उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए रखने और नई पीढ़ी तक उसकी आत्मा पहुँचाने की यह पहल उन्हें एक प्रतिबद्ध समाज सेविका और उत्तराखंडियत की सशक्त प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करती है।

Khushi
Author: Khushi

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