डीएम सविन बंसल के समर्थन में मुखर हुई जनता, प्रशासनिक सख्ती को मिला जनआशीर्वाद

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देहरादून की सुबह जब खुलती है तो वह सिर्फ पहाड़ों की धुंध नहीं ओढ़े होती, उसमें उन उम्मीदों की नमी भी होती है जो बरसों से दफ्तरों के गलियारों में भटकती रहीं। इसी शहर में एक दौर ऐसा भी था जब जनता की शिकायतें फाइलों में दब जाती थीं, जब पीड़ा को तारीख मिलती थी और समाधान को बहाना। उसी शहर में आज अगर लोग यह कहते सुने जा सकते हैं कि प्रशासन दिखता है, सुनता है और जवाब देता है, तो यह किसी चमत्कार का परिणाम नहीं है। यह उस प्रशासनिक जिद का नतीजा है जो कहती है कि कुर्सी सेवा के लिए है, सुविधा के लिए नहीं। सविन बंसल का नाम इसी जिद का पर्याय बनता जा रहा है, और यही बात उन लोगों को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है जिनकी पूरी पहचान, पूरी दुकान ही कमियां गिनाने से चलती है।
जनता दर्शन का दृश्य कोई सरकारी औपचारिकता नहीं होता, वह समाज का आईना होता है। वहां रोते हुए चेहरे आते हैं, कांपती आवाजें होती हैं, आंखों में बेबसी और वर्षों का गुस्सा जमा होता है। अगर वही लोग हंसते हुए लौटते हैं, अगर उनकी आंखों में भरोसा चमकता है, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था ने पहली बार इंसान को देखा है, फाइल को नहीं। सविन बंसल की सबसे बड़ी पहचान यही है कि उन्होंने प्रशासन को फिर से मानवीय बनाया है। आदेश और अनुशासन के बीच संवेदना का पुल खड़ा किया है। यही पुल उन लोगों को खटकता है जिन्हें लगता है कि अफसर अगर सख्त है तो पत्थर होना चाहिए, और अगर संवेदनशील है तो कमजोर। यह द्वंद्व दरअसल उनकी अपनी समझ का संकट है।
आपदा जब पहाड़ों पर उतरती है तो वह सिर्फ मकान नहीं तोड़ती, वह भरोसा भी तोड़ती है। दुर्गम इलाकों में सड़क बनवाना, हेलीपैड तैयार कराना, राहत को समय पर पहुंचाना—ये सब कागजों पर आसान लगते हैं, जमीन पर नहीं। वहां हर कदम जोखिम है, हर फैसला जिम्मेदारी। ऐसे वक्त में जो अफसर फाइल पकड़कर सुरक्षित दफ्तर में बैठा रहे, वह शायद नियमों का पालन कर रहा हो, लेकिन इतिहास में उसका नाम नहीं लिखा जाता। इतिहास उनका लिखा जाता है जो खतरे के बीच रास्ता बनवाते हैं। सविन बंसल का प्रशासन आपदा में सिर्फ आदेश नहीं देता, वह मैदान में दिखता है। यही वजह है कि देहरादून में प्रशासन अब दूर का शब्द नहीं रहा, वह परिचित चेहरा बन गया है।
बालिकाओं की शिक्षा, अनाथ बच्चों का पुनर्वास, कूड़ा बीनने वाले बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश—ये योजनाएं नहीं, ये प्राथमिकताएं हैं। प्राथमिकता वही तय करता है जो सत्ता को सेवा समझता है। जिनके लिए कुर्सी उपलब्धि है, उनके लिए गरीब सिर्फ आंकड़ा होता है। जिनके लिए कुर्सी जिम्मेदारी है, उनके लिए गरीब पहला सवाल होता है। राइफल फंड से मदद हो या भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई, हर कदम यह बताता है कि प्रशासन सिर्फ व्यवस्था चलाने का नाम नहीं, व्यवस्था सुधारने का नाम है।
अब जरा उन आवाजों को सुनिए जो हर सख्ती पर चीख उठती हैं। जो कहते हैं कि कार्रवाई क्यों हुई, नोटिस क्यों गया, कानून क्यों लागू हुआ। सवाल यह नहीं है कि कार्रवाई क्यों हुई, सवाल यह है कि अब तक क्यों नहीं होती थी। जनगणना जैसे राष्ट्रीय कार्य में लापरवाही कोई निजी चूक नहीं, यह देश के साथ लापरवाही है। जब अधिकारी बुलाए जाने के बावजूद बैठक में नहीं आते, जब जिम्मेदारी को हल्के में लिया जाता है, तब कार्रवाई करना क्रूरता नहीं, कर्तव्य है। जो इसे व्यक्तिगत हमला बताते हैं, वे दरअसल व्यवस्था को अपनी जागीर समझने की भूल में हैं। उन्हें लगता है कि प्रशासन कोई पनवाड़ी की दुकान है जहां मन किया तो आए, मन किया तो ताला डाल दिया। यही भ्रम टूट रहा है, और भ्रम टूटने की आवाज सबसे ज्यादा तेज होती है।
सोशल मीडिया पर समर्थन की बाढ़ किसी अचानक उठे ज्वार की तरह नहीं है। यह वर्षों के काम की परत-दर-परत जमा हुई ऊर्जा है। जनता मूर्ख नहीं होती, वह प्रचार और परिणाम में फर्क जानती है। अगर हजारों लोग एक सुर में कह रहे हैं कि यह डीएम हमारा है, तो इसका मतलब है कि उन्होंने अपने जीवन में कुछ बदला हुआ देखा है। सड़क, स्कूल, राहत, सुनवाई—कहीं न कहीं उन्हें लगा है कि प्रशासन ने उनकी बात सुनी है। यही अनुभूति लोकतंत्र की असली कसौटी है।
और जो लोग दिन-रात कीटाणुओं की तरह कमियां ढूंढते फिरते हैं, उनसे एक सवाल पूछा जाना चाहिए—आपने क्या बनाया? कौन सा रास्ता, कौन सा स्कूल, कौन सी उम्मीद? आलोचना जरूरी है, लेकिन वह मेहनत से निकली हो तो सार्थक होती है। खाली दिमाग की आलोचना शोर होती है, विचार नहीं। सविन बंसल की आलोचना दरअसल उनके काम की स्वीकारोक्ति है। क्योंकि काम करने वाला ही निशाने पर होता है, खाली कुर्सी पर बैठे लोग कभी विवाद नहीं बनते।
यह लेख किसी व्यक्ति का गुणगान नहीं, एक प्रशासनिक संस्कृति का बयान है। यह उस मॉडल की बात है जिसमें डीएम सिर्फ आदेश देने वाला अधिकारी नहीं, संकट में खड़ा साथी होता है। जिसमें कानून सख्त है, लेकिन इंसानियत उससे भी सख्त है। देहरादून आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां यह साफ दिखता है कि प्रशासन और जनता के बीच जो खाई थी, वह पाटी जा रही है। यही बात राष्ट्रीय स्तर पर संदेश देती है कि अफसरशाही अगर चाहे तो लोकतंत्र को मजबूत कर सकती है, कमजोर नहीं।
आज सोशल मीडिया पर जो समर्थन उमड़ा है, वह किसी दिन की मेहनत का नतीजा नहीं है। यह उन अनगिनत दिनों की गवाही है जब किसी मां की आंख से आंसू पोंछे गए, जब किसी पहाड़ी गांव तक रास्ता पहुंचा, जब किसी बच्चे को पहली बार किताब मिली। यह समर्थन बताता है कि जनता देख रही है, समझ रही है और याद रख रही है। और यही बात उन लोगों को सबसे ज्यादा डराती है जिनकी सोच स्मृति-हीन समाज पर टिकी होती है।
देहरादून ने यह दिखा दिया है कि प्रशासन अगर ईमानदार हो, सख्त हो और संवेदनशील हो, तो जनता उसके साथ खड़ी होती है। सविन बंसल सिर्फ एक नाम नहीं रह गए हैं, वह उस उम्मीद का नाम बनते जा रहे हैं कि व्यवस्था बदली जा सकती है। और यही उम्मीद सबसे बड़ा तमाचा है उन सबके लिए जो मान बैठे थे कि सिस्टम कभी नहीं बदलेगा।

Khushi
Author: Khushi

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