हत्याओं पर शोर बहुत है, आत्ममंथन गायब, हर वारदात में अफसर नहीं, समाज भी जिम्मेदार

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उत्तराखंडियत के नाम पर आजकल हर मुद्दे का हल सिर्फ “हटाओ-हटाओ” में खोजा जा रहा है। ऊपर से नीचे तक यही शोर—इस आईएएस को हटाओ, उस आईपीएस को हटाओ, ये करो, वो करो। जैसे सिस्टम नहीं, सिर्फ चेहरे ही दोषी हों। जबकि सच्चाई इससे कहीं ज्यादा गहरी और असहज है।
देहरादून का गुंजन हत्याकांड दिल दहला देने वाला है। यह कोई पुरानी रंजिश या खुली दुश्मनी का मामला नहीं था, बल्कि एक परिचित, एक खास इंसान द्वारा नफरत को जुनून में बदलकर की गई हत्या थी। यही पैटर्न ऋषिकेश मामले में भी दिखा—जहां शादी की तैयारी थी और अंत में बात हत्या तक पहुंच गई। सवाल यही है कि अचानक इंसान के भीतर क्या टूटता है, क्या बदलता है, जो प्रेम को हिंसा में बदल देता है।
इसे सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानकर पुलिस पर डाल देना आसान है, लेकिन ईमानदारी से देखें तो यह समाज के भीतर पनपती मानसिकता, असहिष्णुता और भावनात्मक असंतुलन का संकट है। ऐसे मामलों में समाज की भूमिका पुलिस से कम नहीं होनी चाहिए—संवाद, हस्तक्षेप, समय रहते संकेतों को पहचानना। पुलिस हर रिश्ते में झांक नहीं सकती, न ही हर प्रेम प्रसंग को नियंत्रित कर सकती है। किसी के दिमाग में क्या चल रहा है, अपने पार्टनर के प्रति वह किस हद तक जा सकता है—यह सबसे पहले वही दो लोग जानते हैं, सिस्टम नहीं।
इसके बावजूद पुलिस को कोसना, ज्ञान देना, और हर घटना पर अफसरों को टारगेट करना एक फैशन बन गया है। खासकर एसएसपी अजय सिंह को लेकर जो आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं, वे न सिर्फ गैरजिम्मेदाराना हैं बल्कि तथ्यहीन भी। मेहनत, प्रोफेशनल ईमानदारी और जोखिम भरे मामलों को एक्सपोज करने के लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार मिला है, ‘हाकम’ जैसे मामलों में उनकी भूमिका सबके सामने है। हर अपराध को किसी एक अफसर की नाकामी बताना न तो न्याय है, न समाधान।
असल सवाल यह है कि क्या हम समाज के तौर पर अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं? क्या हम आत्ममंथन के बजाय सिर्फ बलि का बकरा ढूंढ रहे हैं? जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं देंगे, तब तक “हटाओ-हटाओ” का शोर चलता रहेगा और ऐसे दिल दहला देने वाले सच हमें बार-बार झकझोरते रहेंगे।

Khushi
Author: Khushi

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