फजीहत में उलझे सत्ता के नेता और जनविश्वास गढ़ते अधिकारी जनदर्शन में डीएम सवीन बंसल ने पेश की संवेदनशील प्रशासन की मिसाल

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उत्तराखंड की राजनीति इन दिनों अजीब द्वंद्व से गुजर रही है एक ओर सत्ता पक्ष के कुछ जनप्रतिनिधि अपने आचरण से सरकार की छवि पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं तो दूसरी ओर वही सरकार के अधिकारी अपने काम से व्यवस्था पर भरोसा मजबूत कर रहे हैं यही विरोधाभास आज की सबसे बड़ी कहानी है
देहरादून में जिलाधिकारी सविन बंसल की अध्यक्षता में आयोजित जनता दर्शन इसका सशक्त उदाहरण बनकर सामने आया है 191 फरियादियों की समस्याएं सुनना केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं थी बल्कि यह संदेश था कि शासन तंत्र यदि इच्छाशक्ति दिखाए तो व्यवस्था संवेदनशील भी हो सकती है और प्रभावी भी
विधवा सुनीता शर्मा की पीड़ा केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं थी वह उस वर्ग की आवाज थी जो अपनों के बीच असहाय हो जाता है भरण पोषण अधिनियम के अंतर्गत वाद दर्ज कराने का निर्देश यह दर्शाता है कि प्रशासन केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहता बल्कि कानूनी संरक्षण भी सुनिश्चित करना चाहता है
नंदिता की शिक्षा को प्रोजेक्ट नंदा सुनंदा से जोड़कर सहायता की पहल यह बताती है कि आर्थिक संकट किसी बेटी की पढ़ाई पर ताला नहीं लगा सकता यदि जिला प्रशासन सजग हो दून बैन्टेज स्कूल और एसजीआरआर विद्यालय से जुड़े प्रकरणों में भी जिलाधिकारी की सख्ती यह स्पष्ट करती है कि शिक्षा को दंड का माध्यम नहीं बनने दिया जाएगा
जल कर माफी का मामला हो या क्यारा धनोल्टी मोटर मार्ग निर्माण में देरी का प्रश्न या फिर अतिक्रमण और दाखिल खारिज जैसे राजस्व विषय हर मामले में संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट तलब करना यह दर्शाता है कि जवाबदेही तय करने की कोशिश हो रही है
मुख्यमंत्री धामी के मार्गदर्शन में यदि जिला प्रशासन इस तरह जनसुनवाई को जनविश्वास का मंच बना रहा है तो यह शासन की सकारात्मक तस्वीर पेश करता है
विरोधाभास यहीं से उभरता है एक तरफ कुछ जनप्रतिनिधियों के विवादित आचरण से सरकार की फजीहत होती है तो दूसरी तरफ आईएएस अधिकारी अपने काम से उसी सरकार को गरिमा प्रदान करते हैं राजनीति जहां कभी कभी आवेग में बह जाती है वहीं प्रशासनिक सेवा धैर्य और प्रक्रिया के माध्यम से भरोसा अर्जित करती है
उत्तराखंडियत का सार यही है कि सत्ता केवल भाषण से नहीं चलती वह संवेदना और क्रियान्वयन से चलती है जनता दर्शन जैसे मंच यदि निरंतरता और पारदर्शिता के साथ चलते रहे तो राजनीतिक शोर के बीच भी प्रशासनिक साख मजबूत होती रहेगी और अंततः जनता उसी को याद रखेगी जिसने कठिन समय में उसका हाथ थामा हो

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Author: Khushi

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