


देहरादून स्थित विश्व संवाद केंद्र में आयोजित पत्रकार होली मिलन समारोह केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं था, बल्कि वह भारतीय चिंतन की उस परंपरा का जीवंत उदाहरण बना, जिसमें संवाद को ही समाज का प्राण तत्व माना गया है। नारायण मुनि भवन में जुटी मीडिया जगत की विविध धाराएँ,मुद्रित, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और सोशल मीडिया,वास्तव में उस व्यापक राष्ट्रीय विमर्श की प्रतीक थीं, जिसकी आवश्यकता आज के संक्रमणकालीन समय में अधिक अनुभव की जा रही है।
भारतीय संस्कृति में उत्सव केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि मन और समाज के शोधन का अवसर होते हैं। होली विशेष रूप से अहंकार दहन, असत्य पर सत्य की विजय और सामाजिक समरसता के पुनर्स्मरण का पर्व है। जब इसी उत्सव को पत्रकार समाज के साथ जोड़ा जाता है, तो उसका अर्थ और गहरा हो जाता है। मीडिया लोकतंत्र का प्रहरी है, किंतु उससे भी पहले वह समाज का संवेदनशील दर्पण है। ऐसे में संवाद, विश्वास और वैचारिक स्पष्टता का वातावरण निर्मित करना समय की आवश्यकता है।
कार्यक्रम में उपस्थित संतों, साहित्यकारों और पत्रकारों ने यह स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व का भाव अनिवार्य है। होली के सांस्कृतिक और दार्शनिक आयामों पर प्रकाश डालते हुए संत वक्ताओं ने यह रेखांकित किया कि भारतीय परंपरा में विविधता विरोध नहीं, बल्कि सहअस्तित्व का आधार है। यह विचार संघ के उस मूल दृष्टिकोण के अनुरूप है जिसमें समाज को खंडों में नहीं, एक जीवंत सांस्कृतिक एकात्मता के रूप में देखा जाता है।
साहित्यिक प्रस्तुतियों ने भी यह संदेश पुष्ट किया कि भारतीय चिंतन में सृजन और संहार परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि संतुलित जीवन-दृष्टि के अंग हैं। शिव का तांडव विनाश का प्रतीक नहीं, बल्कि नवसृजन की प्रस्तावना है। इसी प्रकार समाज में भी जब विकृतियाँ बढ़ती हैं, तो संवाद, आत्ममंथन और सांस्कृतिक पुनर्स्मरण के माध्यम से नवचेतना का मार्ग प्रशस्त किया जाता है।
मीडिया और समाज के संबंधों पर विचार करते हुए यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि सूचना का प्रवाह जितना तीव्र हुआ है, उतना ही भ्रम और वैचारिक ध्रुवीकरण भी बढ़ा है। ऐसे समय में संवाद आधारित पहलें विश्वास बहाली का कार्य करती हैं। संघ का दृष्टिकोण सदैव से यह रहा है कि समाज का प्रत्येक घटक—चाहे वह पत्रकार हो, साहित्यकार हो या सामाजिक कार्यकर्ता—राष्ट्र जीवन की अखंड धारा का अंग है। संवाद के माध्यम से ही समन्वय संभव है और समन्वय से ही समरसता का मार्ग प्रशस्त होता है।
यह आयोजन इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा कि इसमें वैचारिक विविधता के बावजूद आत्मीयता का वातावरण दिखाई दिया। सामूहिक सहभोज और पारंपरिक आदान-प्रदान ने यह संदेश दिया कि मतभेद संवाद से सुलझते हैं, दूरी से नहीं। लोकतंत्र में मीडिया केवल प्रश्नकर्ता नहीं, बल्कि समाज के मानस का मार्गदर्शक भी है। जब वह भारतीयता के मूल भाव,संवाद, सहिष्णुता और सांस्कृतिक आत्मबोध,से जुड़ता है, तो उसकी भूमिका और सशक्त हो जाती है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि होली मिलन के बहाने आयोजित यह संगोष्ठी सांस्कृतिक पुनर्स्मरण, वैचारिक स्पष्टता और सामाजिक समरसता का सशक्त संदेश देने में सफल रही। संघ के शब्दों में कहें तो यह कार्यक्रम “व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण” की उसी अखंड प्रक्रिया का एक सजीव अध्याय था, जिसमें संवाद ही सेतु है, समरसता ही लक्ष्य है और संगठित समाज ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति।







