कागजों में “जीरो टॉलरेंस” अक्सर सिर्फ एक स्लोगन बनकर रह जाता है, लेकिन जब कार्रवाई फाइलों से निकलकर एफआईआर तक पहुंचने लगे तो समझिए सिस्टम ने थोड़ी हिम्मत दिखाई है। गढ़वाल में जो कुछ हुआ, वह उसी हिम्मत की झलक है और इस पूरी कहानी के केंद्र में हैं विनय शंकर पांडेय, जो इस बार सिर्फ मीटिंग लेने नहीं, बल्कि जमीन पर जमी गंदगी साफ करने के मूड में दिखे।
125 मामलों की सुनवाई कोई छोटी बात नहीं होती, और उसमें से 24 मामलों में सीधे एफआईआर के आदेश—यह संकेत है कि अब “देखेंगे” वाला दौर थोड़ा कम और “करेंगे” वाला दौर शुरू करने की कोशिश हो रही है। वरना आमतौर पर ऐसे मामलों में फाइलें इतनी धीरे चलती हैं कि भूमाफिया प्लॉट बेचकर अगली कॉलोनी भी बसा लेते हैं और प्रशासन नोटिंग ही करता रह जाता है।
सबसे दिलचस्प और थोड़ा कड़वा सच वही है जो जांच में सामने आया। बिना जमीन के जमीन बिक गई, 2 बीघा को 4 बीघा बना दिया गया, खसरा नंबर ऐसे बदले गए जैसे बच्चों की कॉपी में पेज बदल दिए हों। यह कोई नया खेल नहीं है, फर्क बस इतना है कि पहले यह खेल “सिस्टम के भीतर” होता था और अब “सिस्टम के सामने” पकड़ा जा रहा है। यहीं पर पांडेय की भूमिका मजबूत दिखती है उन्होंने इस खेल को नोटिस में लेने की बजाय एक्शन में लिया।
थोड़ा व्यंग यही है कि जिन मामलों में सालों से लोग चक्कर काट रहे थे, उनमें अचानक 15 दिन में प्रगति के निर्देश जारी हो गए। यानी काम हो सकता था, बस इच्छा शक्ति की कमी थी। और जैसे ही ऊपर से सख्ती आई, वही पुरानी मशीनरी अचानक तेज दौड़ने लगी। यह सिस्टम की विडंबना भी है और सच्चाई भी।
पांडेय ने एक और अहम बात साफ की—हर विवाद “लैंड फ्रॉड” नहीं होता। कुछ मामलों को कोर्ट का रास्ता दिखाना और कुछ में समझौता कराना, यह बताता है कि कार्रवाई सिर्फ दिखावे के लिए नहीं बल्कि फिल्टर करके की जा रही है। यही वह जगह है जहां एक अफसर की समझ और संतुलन सामने आता है—हर चीज़ को अपराध बना देना आसान है, लेकिन सही केस में ही एफआईआर करना असली प्रशासनिक परिपक्वता है।
फिर भी असली परीक्षा अभी बाकी है। एफआईआर दर्ज करना पहला कदम है, सजा दिलवाना असली मंजिल। अगर ये केस भी बाकी मामलों की तरह सालों तक लटके रहे तो यह सख्ती भी धीरे-धीरे खबरों तक सीमित हो जाएगी। लेकिन अगर इन मामलों में परिणाम आए, सजा हो, और भूमाफिया को असली नुकसान पहुंचे तब यह मॉडल पूरे प्रदेश के लिए मिसाल बन सकता है।
फिलहाल तस्वीर यही कहती है कि गढ़वाल में जमीन के खेल पर पहली बार किसी ने सच में “शिकंजा” कसने की कोशिश की है। और इस कोशिश में विनय शंकर पांडेय एक ऐसे अफसर के रूप में उभर रहे हैं जो फाइलों के नहीं, फैसलों के आदमी दिखते हैं—और सिस्टम को शायद ऐसे ही लोगों की सबसे ज्यादा जरूरत है।








