उत्तराखंड का जंगल जल रहा है और सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर वन विभाग कर क्या रहा है। हर साल गर्मियां आते ही पहाड़ धधकने लगते हैं, जंगलों में आग लगती है, पेड़ राख हो जाते हैं, वन्यजीव मरते हैं, गांवों तक धुआं पहुंचता है, लेकिन वन विभाग हर बार वही पुराना जवाब देता है कि स्थिति नियंत्रण में है। अगर सब नियंत्रण में है तो फिर हर साल सैकड़ों हेक्टेयर जंगल क्यों जल रहे हैं।
इस बार भी फरवरी से मई तक सैकड़ों वनाग्नि की घटनाएं हुईं और बड़ी संख्या में जंगल जलकर राख हो गए। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि जिन जिलों को हर साल संवेदनशील बताया जाता है, वहीं सबसे ज्यादा आग लगती है। इसका मतलब साफ है कि विभाग को खतरे का पहले से अंदाजा होता है, लेकिन तैयारी जमीन पर दिखाई नहीं देती।
वन विभाग के पास कर्मचारी हैं, बजट है, गाड़ियां हैं, फायर लाइन हैं, आधुनिक उपकरण खरीदने की योजनाएं हैं, लेकिन आग लगने के बाद हालात ऐसे दिखते हैं जैसे पूरा सिस्टम अचानक नींद से जागा हो। कई जगह ग्रामीण खुद पेड़ों की टहनियों और बाल्टियों से आग बुझाते नजर आते हैं जबकि विभागीय टीमें देर से पहुंचती हैं। सवाल यह है कि जब हर साल यही स्थिति बनती है तो पहले से मजबूत तैयारी क्यों नहीं होती।
हर बार पिरूल हटाने और जनजागरूकता अभियान की बातें की जाती हैं, लेकिन जंगलों में आज भी सूखे चीड़ के पत्ते बारूद की तरह पड़े रहते हैं। हल्की चिंगारी मिलते ही पूरा जंगल धधक उठता है। अगर विभाग सालभर ईमानदारी से सफाई और निगरानी करे तो आग की घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है, लेकिन यहां काम ज्यादा फाइलों और बैठकों में दिखता है, जमीन पर कम।
सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। अगर किसी इलाके में बार-बार जंगल जल रहे हैं तो क्या कभी किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई? क्या किसी पर सख्त कार्रवाई हुई? आमतौर पर जवाब नहीं में ही मिलता है। हर साल जंगल जलते हैं, नुकसान होता है, फिर कुछ दिन बाद मामला शांत हो जाता है और अगले साल वही कहानी दोहराई जाती है।
जंगल सिर्फ पेड़ नहीं होते, ये पहाड़ की जिंदगी होते हैं। इन्हीं जंगलों से पानी के स्रोत बचते हैं, पर्यावरण संतुलित रहता है और वन्यजीवों का जीवन चलता है। जब जंगल जलते हैं तो उसका असर सिर्फ पेड़ों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे पहाड़ की जिंदगी प्रभावित होती है।
सरकार और वन विभाग आधुनिक उपकरण खरीदने और योजनाओं की बातें जरूर कर रहे हैं, लेकिन लोगों को जमीन पर नतीजे चाहिए। जब मसूरी से लेकर टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा और उत्तरकाशी तक जंगल धधक रहे हों तो सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस और दावे लोगों का भरोसा नहीं बचा सकते।
जरूरत इस बात की है कि वनाग्नि को हर साल की सामान्य घटना मानना बंद किया जाए। गांव स्तर पर स्थायी फायर टीम बनाई जाए, स्थानीय लोगों को संसाधन और जिम्मेदारी दी जाए, और सबसे जरूरी यह कि लापरवाही पर सख्त कार्रवाई हो। क्योंकि अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में उत्तराखंड के जंगल सिर्फ सरकारी रिपोर्टों में बचेंगे, जमीन पर नहीं।








