“जहाँ कुर्सियाँ अफसर नहीं, अटल राय का इंतज़ार करती हैं”

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कुछ व्यक्ति पद पर बैठते हैं, और कुछ पद उन पर गर्व करता है। आईएएस अटल राय उन्हीं व्यक्तित्वों में से एक हैं, जिनके आने भर से हवा में एक अनुशासन की सुगंध घुल जाती है। सहारनपुर मंडल की कुर्सी पर उनका बैठना मात्र एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि जनता की आस्थाओं को दिशा देने वाला निर्णय है।

उनकी कार्यशैली देख कर ऐसा लगता है मानो निर्णय लेने से पहले वे सिर्फ फाइल नहीं पलटते, बल्कि लोगों की धड़कनों की धुन भी सुनते हैं। उनके कार्यालय में घड़ी की सुइयों से तेज़ चलता है उनका चिंतन, और योजनाएं बनती हैं इस अंदाज़ में जैसे शिलालेख खुदे जा रहे हों—अमिट, अमर, अनुकरणीय।

जिस व्यवस्था को लोग ‘बेबस तंत्र’ कह कर टाल देते हैं, उसमें वे जीवन का संगीत भर देते हैं। सरकारी तंत्र में संवेदना की जोत जलाना आज की तारीख़ में दुर्लभ है, और वह दुर्लभता जब अटल राय जैसे अधिकारी में प्रकट होती है, तो जनता के चेहरे पर भरोसे की रौशनी झलकने लगती है।

उनकी आंखों में जो दृढ़ नज़रिया है, वह शासन की गंभीरता का आईना है—ना अत्यधिक कठोर, ना निराशाजनक कोमल। जैसे शब्दों से शेर निकलते हों, वैसे ही उनके आदेशों से योजनाएं निकलती हैं—पारदर्शी, तर्कसंगत और ज़मीनी।

ब्यूरोक्रेसी की आम छवि से वे भिन्न हैं। वे वो अधिकारी हैं, जो ‘फाइलों के बोझ’ में जनता की आवाज़ को नहीं दबाते, बल्कि उसे तरजीह देते हैं। किसी समस्या को देखकर उनके माथे पर शिकन नहीं आती, बल्कि समाधान की मुस्कान खिलती है।

और ये विशेषता यूँ ही नहीं आई। यह अनुशासन, यह संवेदना, यह नेतृत्व क्षमता—सब उस मिट्टी का हिस्सा है, जो उन्हें आज़मगढ़ की लोक-संस्कृति से मिली और जिसे उन्होंने इलाहाबाद की विद्वत्ता से सींचा।

सहारनपुर मंडल के लोग आजकल गर्व से कहते हैं—”हमारे मंडलायुक्त साहब को देखो, उनके आने से ‘कुर्सी’ में आत्मा लौट आई है।” शायद ही कोई अफसर हो, जिसके बारे में ‘जनता’ और ‘व्यवस्था’ एक साथ संतोष की साँस लें।

उनके लिए शब्द चुनना वैसा ही है जैसे चंद्रमा के लिए चांदनी को परिभाषित करना—वह स्वयं में परिभाषा है। उनके बारे में लिखना मानो कलम की परीक्षा है—क्या वह इस स्तर की गरिमा को समेट सकेगी?

ऐसे अधिकारी को देखकर दिल करता है कि शासन तंत्र को बार-बार धन्यवाद दिया जाए—कि उसने किसी अटल राय को इस व्यवस्था में भेजा। और अटल जी को देखकर तो कलम को भी गर्व होता है, कि वह आज उस पर लिख रही है, जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं, शब्द जिन पर स्वयं गर्व करें।


Khushi
Author: Khushi

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