
जब नीयत में खोट हो और ज़मीन पर निगाह हो, तब मजार भी ‘व्यापार’ बन जाती है। देहरादून के बीचोबीच, सरकारी अस्पताल की जमीन पर पनपती एक अवैध मजार ने न जाने कितने सवाल खड़े किए—पर जवाब हमेशा धुंध में रहे। कभी किसी फकीर की निशानी, कभी किसी रहस्य की कहानी, लेकिन सच्चाई ये कि ये महज एक ‘कब्जे का मकसद’ था, जिसे इबादत की चादर से ढकने की कोशिश की जा रही थी।
मरीज़ परेशान, अस्पताल प्रशासन हलकान और शहर वाले हैरान कि आखिर ये मजार किसकी इजाज़त से उग आई? ना नक्शा, ना अनुमति, और ना ही कोई आधिकारिक दस्तावेज। लेकिन हां, चमत्कार की कहानियों से मरीज़ों की जेबें जरूर हल्की होती रहीं। खादिमों ने इबादत की आड़ में आस्था को कारोबार बना लिया था।
और फिर आया सीएम पोर्टल का ‘हीरो कॉल’। ऋषिकेश से पंकज गुप्ता नाम का एक आम नागरिक जब शिकायत करता है, तो ये साबित होता है कि लोकतंत्र में आवाज़ उठाने वाला भी बदलाव ला सकता है। डीएम की टीम जागती है, विभाग हरकत में आते हैं और फिर जो होना चाहिए था, वही होता है।
धामी सरकार का बुलडोजर जब चला तो सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं टूटा, एक झूठ का महल ढह गया। न कोई शोर, न कोई अवशेष—जैसे खुद भी जानता हो कि वो गलत था। देर रात हुई कार्रवाई में पुलिस फोर्स तैनात रही, रास्ता सील हुआ, और बिना किसी तमाशे के ज़मीन ने अपनी असली शक्ल वापस पाई।
कितनी अजीब बात है, कि जब सरकारी ज़मीन पर गरीब अपना झोपड़ा डाल दे तो तुरंत नोटिस चिपक जाता है, लेकिन जब कोई धार्मिक रंग चढ़ा दे तो सबकी आंखें बंद हो जाती हैं। पर अब नहीं। अब धामी का बुलडोजर न धर्म देखता है, न जात—बस सीधा चलता है वहां, जहां कानून की लकीर मिटाई जाती है।
और जो मजार कल तक चमत्कार की दुकान थी, आज उसके मलबे में न कोई निशानी बची, न आस्था का नामोनिशान। कुछ लोग कहेंगे ये आस्था पर हमला था—पर सच्चाई ये है कि ये आस्था के नाम पर कब्जे की दुकान बंद होने की कहानी है।
धामी ने दिखा दिया कि बुलडोजर सिर्फ ज़मीन पर नहीं, सोच पर भी चल सकता है—खासकर उन सोचों पर जो धर्म के नाम पर धोखा बेचते हैं।
कब्ज़ा करने वालों को अब समझ लेना चाहिए—ये नया उत्तराखंड है, यहां आस्था की आड़ में अवैध खेल अब नहीं चलेगा।








