
उत्तराखंड की सियासत में जब कोई मंत्री खुद को ‘राजा हरिश्चंद्र’ से भी बड़ा ईमानदार साबित करने पर तुल जाए, लेकिन पीछे से संपत्ति की फाइलें मोटी होती जाएं, तो जनता समझ जाती है कि कहीं न कहीं “घोड़े बेचकर सोने” वाली स्थिति है — और इसमें घोड़ा बेचने की नहीं, तोड़ने की आदत पुरानी है।
कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी, वही नाम जो एक वक्त घोड़े शक्तिमान की टांग तोड़ने के मामले में सुर्खियों में आए थे, अब खुद ऐसे आरोपों की लाठी से घिर चुके हैं जो सीधे उनकी राजनीतिक नैतिकता की हड्डी-पसली ढीली कर सकती हैं। उस वक्त घोड़ा कुछ दिन तड़पने के बाद चल बसा था — आज हाल ये है कि मंत्री जी की नैतिक छवि भी धीरे-धीरे उसी दिशा में सरकती दिख रही है।
तब घोड़े की टांग टूटी थी, अब मंत्री जी की साख चटक रही है। तब घोड़े ने कुछ नहीं कहा, आज जनता सवाल पूछ रही है। आय से अधिक संपत्ति के गंभीर आरोप, याचिकाओं की बौछार, कोर्ट-कचहरी के चक्कर और राजनीतिक शातिर मुस्कान — यह सब कुछ एक ऐसा चित्र बना चुका है जहां मंत्री जी खुद को ‘राज्य पुरुष’ समझने की भूल में लगातार जनता की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश कर रहे हैं।
कटाक्ष ये है कि जो व्यक्ति कभी घोड़े की टांग तोड़कर अपने ‘जोशीले’ अंदाज़ के लिए बदनाम हुआ था, आज उसकी कुर्सी खुद चरमराने लगी है। सवाल उठता है कि जो दूसरों पर लगाम कसने का दावा करता है, क्या अब खुद पर भी कोई लगाम लगाएगा? या फिर अब भी उन्हें यही लगता है कि उत्तराखंड उनकी जागीर है और वे किसी मुगलिया सल्तनत के नवाब हैं, जिनसे कोई जवाब तलब न करे।
राजनीति में ताकत स्थायी नहीं होती, मंत्री जी। जनता की अदालत जब निर्णय सुनाती है, तो ना घोड़ा बचता है, ना गुरूर। तब सारा ‘जोश’ ठंडा पड़ जाता है, और ‘होश’ नाम की चीज़ अगर बची हो, तो वो जोर से चिल्लाकर कहती है — अब बहुत हुआ!
इसलिए सलाह यही है — अपने भ्रष्ट ‘घोड़े’ को लगाम दो, वरना इतिहास गवाह है, जब जनता की चोट पड़ती है, तो सिर्फ टांगें नहीं, पूरा तंबू उखड़ जाता है।








