उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी पर आय से अधिक संपत्ति का आरोप, अदालत में वाद दायर – अब कुर्सी पर मंडराने लगा खतरा

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उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर भूचाल आता दिख रहा है। इस बार सवालों के घेरे में हैं प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी, जिन पर कांग्रेस प्रवक्ता पंकज सिंह क्षेत्री ने गंभीर आरोप लगाते हुए न्यायालय की शरण ली है। दिनांक 16 मई 2025 को पंकज सिंह क्षेत्री द्वारा देहरादून की चतुर्थ अपर जिला जज अदालत में धारा 175(3) भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता के अंतर्गत एक वाद योजित किया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि मंत्री जी ने अपने नामांकन पत्र में जो संपत्तियाँ घोषित की थीं, वे उनकी वास्तविक चल-अचल संपत्ति से कहीं कम हैं।

कहने को तो मंत्री जी जनता के सेवक हैं, लेकिन सेवक के रूप में काम करते-करते उन्होंने कैसे महल खड़े कर लिए, ये बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है। जब एक आम सरकारी कर्मचारी की आय सीमा स्पष्ट होती है, तो मंत्री जी की गाड़ियों की लंबी कतार और प्रॉपर्टी के अंबार देखकर आंखें चौंधिया जाती हैं। जनता को ये जानने का हक है कि आखिर ये अकूत संपत्ति आई कहां से? क्या ये वेतन और ईमानदार सेवा का फल है या फिर सत्ता के गलियारों में जमा काले पैसे का कमाल?

सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि कांग्रेस प्रवक्ता पहले ही विजिलेंस विभाग में शिकायत दर्ज करा चुके हैं, लेकिन वहां कार्रवाई ठंडे बस्ते में चली गई। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि सत्ता की पहुंच कितनी गहरी है और जांच एजेंसियों पर किसका हाथ है। अंततः न्याय की आस में अदालत का दरवाजा खटखटाया गया, जहां स्पेशल जज सतर्कता ने वाद को स्वीकार करते हुए 21 मई 2025 की तारीख तय की है।

अब मामला केवल आरोप-प्रत्यारोप का नहीं रह गया है, बल्कि दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर निर्णायक जांच की ज़रूरत है। मंत्री जी पर लगे आरोपों की गंभीरता को देखते हुए यह अनिवार्य हो जाता है कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता से हो और अगर ये साबित होता है कि उन्होंने अवैध रूप से संपत्ति अर्जित की है, तो उन्हें कानून के अनुसार सज़ा मिले।

इतना ही नहीं, जिन चल-अचल संपत्तियों की बात की जा रही है, उनकी पूरी शृंखला की जांच की जानी चाहिए – चाहे वो स्वयं के नाम हो या रिश्तेदारों, परिजनों, सहयोगियों के नाम से अर्जित की गई हों। क्योंकि अक्सर देखा गया है कि सत्ता से जुड़े लोग अपने नाम से कम और दूसरों के नाम से अधिक काले धन को सफेद करने का खेल खेलते हैं।

अब जनता की निगाहें अदालत पर टिकी हैं – क्या यह केवल एक और ‘राजनीतिक स्टंट’ निकलेगा या फिर वाकई एक बड़े चेहरे की सियासी कुर्सी हिलने वाली है? जवाब जल्द मिलेगा, लेकिन फिलहाल सन्नाटा है – सत्ता पक्ष में भी और मंत्री जी की जुबान पर भी।

Khushi
Author: Khushi

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