
जिलाधिकारी सविन बंसल का देहरादून में विकास कार्यों पर सख्त रवैया सचमुच प्रशासन की जागरूकता का प्रतीक है। ऐसा लग रहा है जैसे अधिकारियों को अब “काम चलाऊ” नीति छोड़कर “काम कराऊ” नीति अपनानी पड़ रही है। आखिरकार, जब आला अफसरों की नजरों से अव्यवस्था छिप नहीं सकती, तो फिर जेई से लेकर एसई तक की क्या भूमिका रह जाती है? शायद ये लोग ऑफिस में “चुप्पी साधकर” बैठने के लिए ही नियुक्त हैं!
मलबा सड़क पर फैला हो, खुला गड्ढा खुलेआम नजर आए, और सुरक्षा की जमकर धज्जियाँ उड़ाई जाएं — ये सब अब प्रशासन की आंखों में खटकने लगे हैं। लगता है, डीएम साहब को जनता की परेशानी की बजाय अधिकारियों की लापरवाही की ‘दूध की नलकी’ समझ आ गई है। इसलिए साफ हिदायत दी गई है — मलबा फैला तो मुकदमा, सुरक्षा में चूक तो जुर्माना, और अगर काम अधूरा छोड़ा तो… भई, बैन तो तय है!
ये कदम दर्शाता है कि अब ठेकेदारों और विभागों को “काम खत्म कर के छुट्टी” की आदत छोड़नी होगी। जेई और अधीक्षण अभियंता को भी जागना होगा, नहीं तो डीएम साहब उनकी भी छुट्टी करा देंगे। और काम भी रात 10 बजे से सुबह 5 बजे तक ही करना होगा, ताकि दिन के उजाले में जनता को मलबे से गुजरना पड़े—वाह, क्या व्यवस्था है!
क्यूआरटी और ट्रैफिक पुलिस को भी इस जिम्मेदारी के साथ लगाया गया है कि वे जनता की परेशानी न बढ़ने दें। मतलब साफ है, अब कोई भी अधिकारी या कर्मचारी अपने काम को हल्के में नहीं ले सकता। अगर ऐसा होगा तो “कड़क” कार्रवाई के साथ जुर्माना भी बख्शा नहीं जाएगा।
अब सवाल उठता है — आखिर कब तक प्रशासन को इस ‘नाटक’ का मुख्य अभिनेता बनना पड़ेगा, जबकि सड़क पर जेई से लेकर एसई तक की टीम शायद आराम फरमा रही होती है? पर डीएम के निर्देश दिखाते हैं कि अब वह ‘नाटक’ खत्म, असली खेल शुरू हो चुका है।
तो, अधिकारियों को चाहिए कि वे अपनी नींद से जागें और विकास कार्यों को समय पर पूरा करके जनता के चेहरे पर मुस्कान लाएं। क्योंकि अब “काम चलता है” नहीं, “काम चलता रहना चाहिए” की नीति लागू हो चुकी है। वरना डीएम साहब के आदेशों की मार झेलने के लिए शायद कोई नहीं तैयार।
इस जागरूकता भरे कड़े रुख से ही देहरादून की सड़कों पर साफ-सफाई और सुरक्षा का सूरज फिर चमकेगा। और जनता भी कह सकेगी — “अब तो विकास हुआ!”








