“जब अफसर फील्ड में उतरता है, तब सिस्टम बदलता है – देहरादून में DM सविन बंसल का बदलाव मॉडल”

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जब अफसर सिर्फ कुर्सी पर बैठकर आदेश नहीं, ज़मीन पर उतरकर नेतृत्व करते हैं—तब बदलाव की असली तस्वीर उभरती है। देहरादून में डीएम सविन बंसल उस नई पीढ़ी के प्रशासनिक योद्धा हैं, जो फ़ाइलों से नहीं, फील्ड से बदलाव लिखते हैं।

कई सालों से देहरादून का आईएसबीटी मानसून में पानी-पानी होकर प्रशासन का मुंह चिढ़ाता रहा। लोकल लोगों के लिए ये जगह ‘एंट्री प्वाइंट’ कम और ‘जल जमाव का जलजला’ ज्यादा बन चुकी थी। लेकिन इस बार तस्वीर बदली है—और इसके पीछे खड़ा है एक आईएएस जिसकी डिक्शनरी में “समस्या” का जवाब “प्लानिंग”, “डिज़ाइन” और “डेडलाइन” है।

मुख्यमंत्री का निर्देश मिला और सविन बंसल ने “येन केन प्रकारेण” नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग, एक्शन और इरादे से उसे रिकॉर्ड टाइम में धरातल पर उतार दिया। बाक़ी लोग फ़ाइलों में ड्रेनेज डिजाइन बनाते हैं, लेकिन बंसल साहब पहले नाला खुदवाते हैं, फिर ड्रॉइंग पास कराते हैं।

आईएसबीटी का फ्लाईओवर हो, ड्रेनेज चैंबर हों या सीवरेज लाइन—DM ने सिर्फ निरीक्षण नहीं किया, बल्कि “निर्देशों की धार” से सुस्त मशीनरी को तेज़ कर दिया। स्मार्ट सिटी के नाम पर जहां बाकी शहरों में सिर्फ होर्डिंग लगते हैं, देहरादून में DM साहब ने 10 करोड़ की राशि के साथ “स्मार्ट एक्शन” शुरू कर दिया है।

अब हालात ये हैं कि जलभराव के लिए मशहूर आईएसबीटी पर इस बार “मौसम विभाग” नहीं, बल्कि “बंसल विभाग” हावी है। किसी ने कहा कि मानसून आएगा और आईएसबीटी डूबेगा, तो जवाब मिला—“अबकी बार फ्लड नहीं, फ्लो होगा!”

सविन बंसल जैसे अफसर इसलिए अलग हैं क्योंकि वो रिपोर्ट नहीं बनाते, नतीजे बनाते हैं। और ये नतीजे अब आम लोगों की राह आसान बना रहे हैं। जिस राजधानी की पहचान पहले जलजमाव और ट्रैफिक से थी, वहां अब ड्रेनेज सिस्टम, अंडरग्राउंड विद्युत लाइन और ब्लैक टॉप रोड जैसी बातें हकीकत बन रही हैं, वादे नहीं।

हर दिन बदलाव के इस ब्लॉग में आज का किरदार बेशक बंसल साहब हैं, जो ब्यूरोक्रेसी को ‘बाधा’ नहीं, ‘बदलाव’ बना रहे हैं। और अगर यही रफ्तार रही, तो देहरादून सिर्फ राजधानी नहीं, “रोल मॉडल” कहलाएगा।

कल शायद कोई और खबर होगी, लेकिन आज की खबर यही है—
सिस्टम बदल रहा है, क्योंकि अफसर सोच नहीं, मेहनत कर रहा है।

Khushi
Author: Khushi

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