
शहर में जब स्कूल शिक्षा का मंदिर नहीं, बल्कि मोटी कमाई का अड्डा बन जाए, तो प्रशासन का बुलडोज़र केवल दीवारों पर नहीं, लालच पर भी चलना ज़रूरी हो जाता है। देहरादून में ज़िला प्रशासन ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया — और इस बार शिकार बनी वो शिक्षित-धनिक जमात, जो अभिभावकों की मजबूरी को ‘एटीएम मशीन’ समझ बैठी थी।
द प्रेसिडेंसी इंटरनेशनल स्कूल, भनियावाला — नाम से ही लगता है जैसे विदेशों की हवा खा आया हो, लेकिन जब प्रशासन ने दस्तावेज़ों की हवा ली, तो महक कुछ और ही निकली। बिना मान्यता नवीनीकरण के स्कूल चलाना और ऊपर से फीस में मनमर्ज़ी बढ़ोतरी करना, अब साहब! ये तो वही बात हुई — चोरी भी, और ऊपर से प्रेस रिलीज़ भी।
लेकिन जिलाधिकारी सविन बंसल ने एक बार फिर साबित किया कि प्रशासनिक कुर्सी सिर्फ बैठने के लिए नहीं होती, कभी-कभी उस पर खड़े होकर फैसले लेने भी पड़ते हैं। स्कूल को ₹5,72,000 की पेनल्टी ठोक दी गई — और वो भी ऐसे कि स्कूल प्रबंधन को चेकबुक निकालने में देरी नहीं लगी।
अक्सर नामी-गिरामी निजी स्कूलों की ‘प्रेस्टीज’ ऐसी होती है कि प्रशासन भी सोचता है, “छोड़ो, इनसे पंगा क्यों लेना?” मगर देहरादून में मामला उल्टा हो गया — इस बार प्रशासन ने कहा, “पंगा अब हम लेंगे, और सीधा लेंगे!” और स्कूल वालों के तेवर ऐसे ढीले हुए जैसे बच्चा गणित की परीक्षा में बिना पढ़े बैठ गया हो।
ताज़ा हालात कुछ यूं हैं कि स्कूल प्रबंधन खुद जिला प्रशासन को चिट्ठी लिखकर कह रहा है, “हुजूर! हम फीस कम कर रहे हैं।” अब इससे बड़ा प्रायश्चित और क्या होगा?
यह कार्रवाई सिर्फ एक स्कूल पर नहीं, पूरे शिक्षा माफिया के मानस पर चोट है। वो माफिया जो अभिभावकों की आंखों में ‘एडमिशन लोन’ के सपने दिखा कर फीस की छुरी चलाते थे — अब खुद सपनों से डरने लगे हैं।
एक दौर था जब शिक्षा देने वाले खुद फीस की रसीद से ज़्यादा ईमानदार हुआ करते थे। आज के दौर में जब स्कूल भवन से ज़्यादा भारी फीस स्ट्रक्चर हो, तब ऐसा ठोस प्रशासनिक निर्णय उम्मीद जगाता है कि शायद अब ‘शिक्षा का व्यापार’ थोड़ा सा ‘सेवा’ की ओर मुड़े।
मुख्यमंत्री के निर्देशों की पालना में जिलाधिकारी सविन बंसल जिस प्रकार शिक्षा माफियाओं की गर्दन पर नियम-कानून की तलवार चला रहे हैं, वह प्रशंसा नहीं, उदाहरण के योग्य है। ऐसा नहीं है कि स्कूलों में सुधार की गुंजाइश नहीं थी, बस कोई दरवाज़ा खटखटाने वाला चाहिए था — अब दरवाज़ा नहीं, प्रशासन ने पूरा गेट ही खोल दिया है।
शिक्षा माफियाओं को ये भी समझ लेना चाहिए कि अगर किताबों में “ईमानदारी” पढ़ाई जाती है, तो उसकी शुरुआत खुद उनके ऑफिस से होनी चाहिए। वरना अगली बार चिट्ठी नहीं, कोर्ट की समन मिलेगी।
अभिभावक भी अब चैन की सांस लें — क्योंकि उन्हें पता है कि कोई तो है जो उनके हक़ में खड़ा है, और ये खड़ा होना दिखावे के लिए नहीं, बल्कि कार्रवाई के साथ है।
शिक्षा का स्तर तभी ऊपर जाएगा जब फीस की ऊंचाई ‘गगनचुंबी’ नहीं होगी। और ये तभी होगा जब जिला प्रशासन अपनी रीढ़ यूं ही सीधी रखे, और प्राइवेट स्कूलों को याद दिलाता रहे — कि ये देहरादून है, कोई टैक्स फ्री एजुकेशन मार्केट नहीं।
शाबाश प्रशासन! अब अगली पारी का इंतज़ार रहेगा — शायद अगला स्कूल खुद चलकर दफ्तर आए और कहे, “हमें भी सुधारना है खुद को, प्लीज पेनल्टी थोड़ी कम लगाइए।”








