“सीएम हेल्पलाइन मायने मेरी”: डीएम सविन बंसल ने सिस्टम को दी तीन दिन की चुनौती, अफसरशाही में मचा हड़कंप

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एक वक्त था जब सीएम हेल्पलाइन सिर्फ़ एक नंबर थी—कुछ रिंगिंग टोन, कुछ उबासी लेते कर्मचारी, और अंत में “प्रोसेस में है” की झुनझुनी में फंसी जनता की उम्मीद। लेकिन अब देहरादून में जिलाधिकारी सविन बंसल ने इस सुस्त सिस्टम की चूलें हिला दी हैं। अब सीएम हेल्पलाइन सिर्फ़ जनता की नहीं, अफसरों की भी परीक्षा बन गई है।

जब डीएम सविन बंसल जैसे अधिकारी खुलकर कहते हैं “सीएम हेल्पलाइन मायने मेरी, हम सब अफसरों की हेल्पलाइन,” तो इसका अर्थ बहुत गहरा है। यह केवल एक लाइन नहीं, पूरे सरकारी सिस्टम को आईना दिखाने वाला वाक्य है। और जब डीएम खुद एक-एक विभाग की पेंडिंग शिकायतें खुलवा-खुलवाकर देखने लगें, तो समझ जाइए कि अब नज़रिया बदल चुका है।

36 दिन से ज़्यादा समय से पेंडिंग शिकायतों को देखकर डीएम सख़्त हो गए। एक तरफ शिकायतों का अंबार—पुलिस विभाग की 478, यूपीसीएल की 361, जल संस्थान की 276, नगर निगम की 244 शिकायतें लटकती हुईं—तो दूसरी तरफ डीएम साहब का तीन दिन का अल्टीमेटम: या तो समाधान दो या फिर तैयारी करो विभागीय गाज की।

सविन बंसल ने जिस अंदाज़ में मीटिंग में तेवर दिखाए, उससे ये साफ हो गया कि अब “समाधान टालो, मामला दबाओ” वाली शैली की छुट्टी होने वाली है। अब अधिकारियों से सिर्फ़ जवाब नहीं, संतोषजनक निस्तारण की उम्मीद है। डीएम ने निर्देश दिए कि फीडबैक कॉल्स को भी गंभीरता से लिया जाए—मतलब सिर्फ़ “डन” लिख देने से काम नहीं चलेगा, जब तक शिकायतकर्ता संतुष्ट न हो जाए।

तंज यह है कि जिन विभागों के अफसर अब तक सीएम हेल्पलाइन को “औपचारिकता” समझते थे, उनके लिए ये चेतावनी की घंटी है। अब शिकायतें रजिस्टर में नहीं, रिपुटेशन में दर्ज होंगी। और अगर कोई अधिकारी सोचता है कि वो सिस्टम से ऊपर है, तो उसे याद रखना चाहिए कि सविन बंसल जैसे जिलाधिकारी अब सिस्टम को नीचे से ऊपर तक झाड़ रहे हैं।

तकनीकी दक्षता की बात करते हुए डीएम ने अफसरों से यह भी कहा कि अपने कार्मिकों को अपडेट रखें, क्योंकि अब गवर्नेंस पेपर फाइल से निकलकर पोर्टल और पब्लिक की हथेली पर आ चुकी है। यानी जवाबदेही अब डिजिटल है, और जवाब न देने वालों की फाइलें अब नोटिसों से भरने वाली हैं।

डीएम सविन बंसल ने न केवल समीक्षा की, बल्कि स्पष्ट कर दिया कि जो अफसर सीएम हेल्पलाइन को हल्के में लेंगे, वे अगली मीटिंग में खुद कटघरे में खड़े दिखेंगे। और इस बार “मुझे जानकारी नहीं थी” या “नेट स्लो था” जैसे बहाने नहीं चलेंगे।

तो अब यह साफ है—देहरादून प्रशासन में अब गंभीरता का मौसम आ गया है। और अगर कोई अभी भी पुरानी आदतों में डूबा है, तो उसके लिए यह ब्लॉग नहीं, जागने की अंतिम घंटी है।

क्योंकि जब डीएम खुद कहें “सीएम हेल्पलाइन हमारी जवाबदेही का आईना है,” तो फिर अफसरशाही के लिए अब आईना देखना ही नहीं, संभलना भी ज़रूरी है।

Khushi
Author: Khushi

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