
उत्तराखंड के देहरादून में अब न बिजली जाएगी, न प्रशासन सोएगा — क्योंकि अब कमान सविन बंसल के हाथ में है। डीएम बंसल ने जिस तेवर में बिजली विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को उनकी “औकात” और “जिम्मेदारी” दोनों याद दिलाई है, वो शायद दशकों तक याद रखा जाएगा।
कर्मचारियों की हड़ताल, धरना, गाली-गलौच, विभागीय कार्यों में बाधा — सब कुछ उस पुराने दौर की याद दिला रहे थे जब सिस्टम कमज़ोर होता था और कर्मचारी संघ ‘माई बाप’ बन जाते थे। लेकिन अफ़सोस! अब वो दौर नहीं है, अब धामी राज में बंसल ब्रांड की प्रशासनिक बिजली चल रही है, जो कटने नहीं दी जाएगी।
“सब स्टेशन हमारे, इलाका हमारा, जनमन भी हमारा” — डीएम बंसल का ये बयान सिर्फ शब्द नहीं, चेतावनी है उन कर्मचारियों को जो अपने राजनीतिक संरक्षकों की छांव में आम जनता को अंधेरे में रखना चाहते हैं। सरकार की सेवाओं को बंद कर जनता को बिजली संकट में धकेलने की जो हिमाकत हो रही थी, अब उस पर एस्मा की छांव पड़ चुकी है। जी हां, वही एस्मा — जिसकी भनक लगते ही कर्मचारी संगठन का गर्म खून भी ठंडा पड़ जाता है।
दरअसल ये सिर्फ प्रशासनिक सख्ती नहीं, बल्कि संदेश है – “जनता के धैर्य की परीक्षा मत लो, वरना आपराधिक धाराएं इंतज़ार में हैं।”
सवाल ये है कि ये हड़ताल किसलिए? किसके लिए? गालियां और गुटबाज़ी क्या नई प्रशासनिक मांग बन चुकी है? अगर आंदोलन का यही रूप है, तो फिर कर्मचारियों से लेकर अधिकारियों तक, सबको लोकतंत्र और जिम्मेदारी की दोबारा ट्यूशन की ज़रूरत है।
बंसल ने सटीक निशाना लगाया – “भयोदोहन की स्थिति में विद्युत आपूर्ति करना आता है हमें”। यानी साफ-साफ, डराने की कोशिश मत करो, अब डर प्रशासन नहीं खाएगा – डरोगे तुम!
सविन बंसल जैसे अफसरों की खासियत यही होती है — वे चेतावनी नहीं देते, सीधा ऐक्शन लेते हैं। और जो प्रशासन अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने दायित्वों को भी समझता है, वही सही मायनों में जनता का भरोसा बनता है।
सवाल अब कर्मचारियों का नहीं, सवाल जनता का है – और उत्तराखंड का नया अध्याय अब उसी पन्ने से शुरू हो रहा है, जहां सिस्टम का मतलब सिर्फ कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी भी होती है।








