“बरसात से पहले ही बहने लगे अफसरों के पसीने – डीएम सविन बंसल की सख्ती ने जल विभाग में मचाई खलबली”

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मानसून आया नहीं, लेकिन डीएम साहब की तैयारी ने अफसरों की पेशानी पर पसीना ला दिया है।

देहरादून की फिज़ाओं में अभी बारिश की बूंदें नहीं टपकीं, लेकिन जिलाधिकारी सविन बंसल की सख्ती ने पहले ही जल विभाग के अफसरों को निचोड़ कर रख दिया है। लगता है इस बार बारिश से पहले “फील्ड रिपोर्ट” में ही बहाव शुरू हो गया है — अफसरों के चेहरों से।

20 अप्रैल से जबसे कंट्रोल रूम एक्टिव हुआ है, तबसे शिकायतों की गिनती शुरू है और अफसरों की नींद खत्म। 130 शिकायतें आईं, 126 का निस्तारण हुआ — यानी लगभग हर शिकायत पर एक्शन हुआ, ये आंकड़ा जितना अच्छा लग रहा है, उतना ही पसीना-पसीना किए दे रहा है जिम्मेदारों को। 24×7 कंट्रोल रूम की निगरानी में काम करना अब विभागों के लिए आराम नहीं, इम्तहान बन चुका है।

डीएम साहब ने हर उस पाइपलाइन पर नजर रखने के आदेश दिए हैं, जो लीकेज से जनता के भरोसे को रिसने देती है। बारिश हो या बाढ़, डीएम चाहते हैं कि पानी की सप्लाई का पाइप नहीं, अफसरों की जवाबदेही न बहे। “गंदा पानी नहीं चाहिए” — आदेश तो छोटा है, लेकिन इसके पीछे इतनी चिल्ल-पों मच रही है कि जल संस्थान में पानी से ज़्यादा माथापच्ची बह रही है।

टोल फ्री नंबर प्रचारित हो चुका है, यानी अब “बहाना तंत्र” का पानी उतर चुका है। अब जनता फोन उठाएगी और फील्ड अफसरों की सांसें चढ़ जाएंगी। नलकूप हो या ट्यूबवेल, डीएम साहब की नजर हर बूंद पर है — और अफसरों की हालत हर ड्रॉप पर ड्रिप हो चुकी है।

जिला स्तर पर बनी समिति, एडीएम की अध्यक्षता में मॉनिटरिंग — ये सब अब विभागीय अफसरों के लिए कोई सामान्य मीटिंग नहीं, बल्कि “पूछताछ की अदालत” बन चुकी है। गलती नहीं, गलती की संभावना भी अब “गंभीर अपराध” की तरह देखी जा रही है।

डीएम बंसल का इशारा साफ है — बरसात आए, लेकिन बहाव सिर्फ नालों में हो, अफसरों की कार्यप्रणाली नहीं। और अगर लीकेज मिला, तो कार्रवाई सिर्फ मरम्मत पर नहीं, अफसरों पर भी तय है।

ये कोई सामान्य तैयारी नहीं है, ये उस सिस्टम की रगड़ाई है जिसे अक्सर बरसात के नाम पर धोने की आदत रही है। इस बार अफसरों को जनता नहीं, डीएम की फील्ड रिपोर्टिंग से डर लग रहा है।

पानी आए या न आए, इस बार जिम्मेदारों के गाल लाल हो चुके हैं — शर्म से नहीं, सख्ती की तपन से।

Khushi
Author: Khushi

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