“जब मुज़फ्फरनगर की ‘क्राइम कैपिटल’ वाली पहचान को ध्वस्त कर गया एक आईपीएस अफसर”

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2004 का मुज़फ्फरनगर… नाम सुनते ही अगर आपके ज़ेहन में गन्ने की मिठास आती है, तो माफ कीजिए — उस वक्त इस ज़िले की पहचान थी गोलियों की गूंज और गैंगवार की गंध। गन्ने के खेतों से ज़्यादा चर्चित थे यहां के शूटर, और पंचायत की बैठकों से ज़्यादा पावरफुल थे यहां के ‘माफिया दरबार’।

तब मुज़फ्फरनगर को ‘क्राइम कैपिटल’ कहा जाता था — और वो भी बिना किसी अतिशयोक्ति के। पुलिस की वर्दी अक्सर अपराधियों के चरण स्पर्श में व्यस्त रहती थी, और कानून? वो तो कहीं गली के नुक्कड़ पर चाय की दुकान पर बैठा, फटे पन्नों वाले CRPC की किताब के साथ धूल फांक रहा था।

और फिर आया तेज तर्रार, विद्रोही सोच वाला एक अफसर — नवनीत सिकेरा। नाम छोटा, इरादा बड़ा। जब बाकी अफसर थानों की फाइलों में नक्सली क्रांति की तलाश कर रहे थे, तब सिकेरा ने सिस्टम के भीतर बैठी सड़ी हुई सोच पर धावा बोल दिया।

‘अपराधियों से बातचीत नहीं, टकराव होता है’ — इस सिद्धांत पर चलते हुए उन्होंने सिर्फ इतिहास नहीं बदला, हिस्ट्रीशीट भी फाड़ दी।

जो पुलिस रिकॉर्ड में ‘कुख्यात’ थे, वो सिकेरा की नजर में इंसान थे। जो रजिस्टर में हिस्ट्रीशीटर थे, वो ज़िंदगी में बेगुनाह थे। और जो वर्षों से ‘अपराधी’ घोषित किए जा चुके थे, उनकी सबसे बड़ी गलती यही थी कि वो किसी ज़मींदार, विधायक या दबंग का विरोध कर बैठे थे।

सिकेरा ने न केवल निर्दोषों की हिस्ट्री मिटाई, बल्कि असली हिस्ट्री भी रच दी। उन्होंने उन अपराधियों की ‘गद्दी’ हिला दी जो थाना को फोन पर निर्देश देते थे।

जिनके नाम सुनकर अफसरों के फोन “स्विच ऑफ” हो जाते थे, उन नामों की अब लाठी और हथौड़े से ताबड़तोड़ पिटाई होने लगी। एक के बाद एक — अवैध वसूली के अड्डे, हथियारों की फैक्ट्री, ज़मीन पर जबरन कब्जे, और बाहुबली साम्राज्य — सब ध्वस्त होने लगे।

गांव वाले पहले हैरान हुए, फिर राहत की सांस ली।
थानों के बाहर खड़ी जीपों पर अब लाल बत्ती नहीं, सिर्फ धूल दिखती थी।

सिकेरा ने उस दौर में सिर्फ गुंडों की कमर नहीं तोड़ी, पूरे अपराध-राजनीति-प्रशासन के गठजोड़ की रीढ़ पर प्रहार कर दिया।

तब शायद सिस्टम भी चौंका होगा — “कौन है ये जो ग़लत को ग़लत कह रहा है? हमारे तो ऐसे संस्कार नहीं!”

एक दौर था जब थानों में नाम आने से अपराधी बनते थे, लेकिन नवनीत सिकेरा ने साबित कर दिया कि पुलिस अगर चाहे, तो नायक भी बना सकती है।

2004 का मुज़फ्फरनगर इस बात का सबूत है कि एक ईमानदार अफसर अगर ठान ले —
तो न सिर्फ हिस्ट्रीशीट फाड़ सकता है,
बल्कि इतिहास भी रच सकता है।

Khushi
Author: Khushi

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