
बिहार चुनाव बीजेपी के लिए नये तरीके की चुनौतियां लेकर आ रहा है. बीजेपी नेतृत्व ने वैसे तो एहतियाती उपाय कर लिये हैं. और, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भीसंघ प्रमुख मोहन भागवत बिहार के दो दिन के दौरे पर थे, और इस साल ये उनका दूसरा दौरा था. मार्च, 2025 में भी वो पांच दिन के बिहार दौरे पर गये थे।जातीय राजनीति के साये में हो रहे बिहार चुनाव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं। जातीय जनगणना के मुद्दे पर आरएसएस और बीजेपी का रुख नीतीश कुमार सरकार के विपरीत है, जो जातीय जनगणना के पक्ष में हैं।
*चुनौतियों के कारण:*
– *जातीय समीकरण*: बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जातीय जनगणना के मुद्दे पर आरएसएस और बीजेपी को अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए नई रणनीति बनानी होगी।
– *वोट बैंक की राजनीति*: जातीय जनगणना के मुद्दे पर आरएसएस और बीजेपी को अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए विशेष प्रयास करने होंगे, ताकि वे बिहार विधानसभा चुनाव में अपना प्रभाव बनाए रख सकें।
– *राजनीतिक समीकरणों में बदलाव*: जातीय जनगणना के कारण बिहार की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं और पुराने समीकरण बदल सकते हैं, जो आरएसएस और बीजेपी के लिए चुनौतियां पैदा कर सकते हैं।
*आरएसएस और बीजेपी की रणनीति:*
– *जातीय जनगणना पर रुख*: आरएसएस और बीजेपी को जातीय जनगणना पर अपने रुख को स्पष्ट करना होगा और इसके पक्ष या विपक्ष में अपने तर्क प्रस्तुत करने होंगे।
– *वोट बैंक को मजबूत करना*: आरएसएस और बीजेपी को अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए विशेष प्रयास करने होंगे, जैसे कि जातीय समुदायों के साथ जुड़ना और उनकी मांगों को पूरा करने का प्रयास करना।
– *नई रणनीति बनाना*: आरएसएस और बीजेपी को बिहार विधानसभा चुनाव के लिए नई रणनीति बनानी होगी, जिसमें जातीय जनगणना के मुद्दे को ध्यान में रखा जाए और इसके अनुसार अपने अभियान को चलाया जाए।








