
12 जून 2025 — देहरादून में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का दौरा, प्रोटोकॉल के मुताबिक़ सारी व्यवस्थाएँ चाक-चौबंद, अधिकारी तैनात, सुरक्षा मुकम्मल। लेकिन बस एक कॉल, जो उनके स्टाफ ने डीएम ऑफिस में किया, उस पर ‘तुरंत’ जवाब नहीं मिला — और यहीं से शुरू हो गया राजनीतिक ईगो का महासंग्राम।

अब देखिए नाटक — भारत सरकार का मंत्रालय “चिंता” जता देता है, उत्तराखंड शासन “स्पष्टीकरण” मांग लेता है, और जिला प्रशासन को अभियुक्त की तरह कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
गुनाह?
बस यही कि डीएम सविन बंसल किसी जरूरी बैठक में व्यस्त थे और फोन नहीं उठा सका।
ये प्रोटोकॉल नहीं, प्रतीक है उस व्यवस्था का, जिसमें लोकतंत्र की दुहाई देने वाले खुद लोकतांत्रिक मर्यादा की कब्र खोदते हैं।
डीएम से कोई ये नहीं पूछता कि उन्होंने जनता के लिए क्या किया, विकास के मोर्चे पर क्या उपलब्धियाँ रहीं, शहर की समस्याओं के लिए क्या फैसले लिए —
पूछा जा रहा है तो सिर्फ ये:
“नेता जी का फोन क्यों नहीं उठाया?”
शर्म की बात है कि अफसर की कर्मठता को एक मिस कॉल से तौला जा रहा है।
और ये कोई आम अफसर नहीं — सविन बंसल, जिन्हें उत्तराखंड का तेज़तर्रार, जमीन से जुड़ा और परिणाम देने वाला अधिकारी माना जाता है।
लेकिन क्या फर्क पड़ता है जब पद की गरिमा नेता की भावना से छोटी हो जाए?
आज की राजनीति को अफसर नहीं चाहिए, वफादार दरबारी चाहिए।
जो फोन उठाए, गुलदस्ता थामे स्वागत करे, और मंच से “माननीय” के गुणगान करे।
सिस्टम सुधारने वाला अफसर इस व्यवस्था में “अनुशासनहीन” करार दे दिया जाता है,
क्योंकि उसने काम को प्राथमिकता दी, चरणवंदना को नहीं।
जिस चिट्ठी को शासन ने डीएम को भेजा है, वह दरअसल सिर्फ एक औपचारिक पत्र नहीं —
वो एक कटाक्ष है उस व्यवस्था पर जो अब नेता के इगो की रक्षा को प्रोटोकॉल कहती है।
कभी-कभी लगता है ये लोकतंत्र नहीं, “लो-कॉल-तंत्र” बन गया है।
जहाँ अफसर की नीयत नहीं, नेटवर्क देखा जाता है।
जहाँ जनता के लिए काम करने वाला अफसर गलत और नेता की नाराज़गी सही मानी जाती है।
तो अब सिस्टम को ईमानदार अफसरों से नहीं, खामोश, झुके हुए अफसरों से लगाव है।
जो जवाबदेह हों नेताओं के, न कि जनता के।
लेकिन अफसोस! सविन बंसल जैसे अफसर न तो झुकते हैं, न बिकते हैं।
और शायद यही बात सत्ता के गलियारों में सबसे ज़्यादा अस्वीकार्य होती है।
इसलिए हम कहेंगे —
यह न प्रोटोकॉल का उल्लंघन था, न अनुशासनहीनता —
यह बस एक ईमानदार अफसर का काम के प्रति समर्पण था,
जिसे कुछ लोगों ने व्यक्तिगत अपमान का हथियार बना लिया।
अगर लोकतंत्र को चलाना है, तो अफसरों की रीढ़ सीधी रहने दो।
वरना अगले कॉल के मिस होते ही व्यवस्था फिर एक चिट्ठीबाज़ी का तमाशा बन जाएगी।








