“नाम में क्या रखा है? महर्षि ने धामी सरकार के ‘तुगलकी फरमान’ पर उठाए सवाल”

SHARE:

नाम पट विवाद पर राजीव महर्षि का हस्तक्षेप सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक अनुभवी और संवेदनशील नेता की चेतावनी है, जिसे नजरअंदाज करना सत्ता के अहंकार की भूल हो सकती है। उत्तराखंड की धामी सरकार द्वारा कांवड़ यात्रा के दौरान दुकानों पर नाम पट अनिवार्य करने का आदेश पहली नजर में प्रशासनिक लग सकता है, लेकिन इसके सामाजिक और सांप्रदायिक निहितार्थ बेहद गहरे हैं – और यही बात महर्षि ने बेहद सधे शब्दों में कह दी।

महर्षि पूछते हैं – नाम बताने में हर्ज नहीं, लेकिन बताने की मंशा क्या है? ये सवाल चुभता जरूर है, लेकिन इससे कन्नी काटना आसान नहीं। अगर प्रशासनिक कारण होते, तो ये नीति पूरे देश में लागू होती। लेकिन ऐसा नहीं है। क्या उत्तराखंड प्रयोगशाला बन रहा है उस नीति की, जिसमें नागरिकों को उनके नाम से परखा जाएगा?

उन्होंने एक सीधा और तार्किक सवाल रखा – क्या यही आदेश सरकार जम्मू-कश्मीर या नॉर्थ ईस्ट में लागू करेगी? नहीं करेगी। क्यों? क्योंकि वहां राजनीतिक समझदारी हावी है, और यहां, शायद सस्ती लोकप्रियता।

राजनीतिक चालों की बिसात पर जब धार्मिक यात्रा के बहाने सामाजिक ताने-बाने को छेड़ा जाए, तो समझना चाहिए कि कुछ तो सड़ा हुआ है। और ऐसे में महर्षि जैसे नेता वह आईना पकड़ाते हैं जिसमें सत्ता को अपनी शक्ल देखने की हिम्मत चाहिए।

उत्तराखंड में जहां लोग हर रोज़ मलबे में दब रहे हैं, सड़कें टूटी पड़ी हैं, पर्यटन ठप हो रहा है, वहां सरकार की प्राथमिकता अगर दुकानों पर नाम पट लिखवाना है, तो ये शासन नहीं, सस्ता स्टंट है। शायद यही वजह है कि महर्षि ने इसे “तुगलकी फरमान” कहा।

महर्षि की बातों में सिर्फ आलोचना नहीं, बल्कि चेतावनी है – कि विभाजनकारी नीतियों का असर चुपचाप नहीं रहेगा। समाज टूटता है, तो सियासत खुद भरभरा जाती है।

और अंत में, सवाल बड़ा है – अगर नाम से नुकसान होता है, तो जिम्मेदार कौन? सरकार जवाब दे या कम से कम इतना कहे कि ये सब सिर्फ कांवड़ की सुरक्षा के लिए है, न कि किसी को अलग-थलग करने की स्कीम।

लेकिन शायद जवाब से ज्यादा ज़रूरत है, नीयत की सफाई की। और जब तक सरकार अपनी नीयत साफ़ नहीं करती, तब तक महर्षि जैसे नेता हर मंच से पूछते रहेंगे – “नाम में क्या रखा है?”

Khushi
Author: Khushi

Leave a Comment

सबसे ज्यादा पड़ गई