
“आरएसएस की आत्मा से गढ़ा सेवक: विश्वास डाबर, जो राजनीति नहीं राष्ट्रसेवा करते हैं”
उत्तराखंड की राजनीति में अगर कोई नाम आजकल बिना शोर के अपनी गहराई के कारण चर्चा में है, तो वो हैं विश्वास डाबर। न कोई बड़ा मंचीय भाषण, न सियासी शोर-शराबा, और न ही मीडिया में खुद को जबरन परोसने की कोशिश… लेकिन फिर भी वो चर्चा में हैं, क्योंकि जो सचमुच जनता के लिए काम करता है, उसकी गूंज किसी विज्ञापन की मोहताज नहीं होती।
डाबर जी की छवि एक ‘राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता’ की है, जो सुनने में अजीब लग सकता है, क्योंकि आजकल राजनीति और समाजसेवा एक-दूसरे के विपरीतार्थक शब्द जैसे हो गए हैं। मगर डाबर जी उन विरले चेहरों में से हैं जो सत्ता में रहकर भी समाज के सबसे नीचे पायदान पर खड़े व्यक्ति को अपनी प्राथमिकता मानते हैं। वो मंत्री हैं, लेकिन पहले स्वयंसेवक हैं — और यह बात उनके निर्णयों, व्यवहार, और जीवनशैली से झलकती है, न कि किसी परिचय पत्र से।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिस मूल भाव — ‘निज जीवन को राष्ट्र को समर्पित करना’ — को आज के समय में सिर्फ भाषणों और होर्डिंग्स तक सीमित कर दिया गया है, उसे विश्वास डाबर जी ने आत्मसात कर रखा है। वो उन दुर्लभ कार्यकर्ताओं में से हैं जिन्होंने संघ के उस दौर को जिया है जब ‘संघी’ कहलाना चुनौती थी, फैशन नहीं। विपरीत समय में भी डटे रहना, साथियों को संभालना, और विचारधारा से डगमग न होना — यह सब उनके व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं, मूल है।
आज जबकि राजनीति में ‘पार्टी’ ही परम सत्य बन चुकी है, डाबर जी जैसे लोग हमें याद दिलाते हैं कि सत्ता सेवा का माध्यम हो सकती है, साधन नहीं। उनकी कार्यशैली में एक अद्भुत संतुलन है — विचारधारा के प्रति अडिग और व्यवहार में सर्वसमावेशी। यही कारण है कि वो सिर्फ आरएसएस के स्वयंसेवकों के लिए ही आदर्श नहीं हैं, बल्कि हर उस युवा के लिए प्रेरणा हैं जो राजनीति में सेवा की भावना से प्रवेश करना चाहता है।
उनके भीतर का राष्ट्रवाद शोरगुल में नहीं, बल्कि शांत और सुदृढ़ कार्यों में दिखाई देता है — जैसे कोई नदी जो बिना छलके, परंतु गहराई से बहती है। वो राष्ट्रवाद जो टेलीविजन डिबेट्स में नहीं बल्कि गांव की पगडंडियों पर, गरीब की झोपड़ी में और छात्र के किताबों के पन्नों में महसूस होता है। उनका विजन विकास का है, लेकिन दिशा सुसंस्कारों की ओर है — और यही उन्हें भीड़ से अलग बनाता है।
विश्वास डाबर जैसे लोग राजनीति में ऑक्सीजन जैसे हैं — दिखते नहीं, पर जीवंत रखते हैं। कभी किसी के राशन की चिंता, कभी किसी विधवा की पेंशन अटकी है तो खुद फॉलोअप करना, और अगर कोई स्वयंसेवक संकट में हो तो मंत्री पद की मर्यादा से पहले खड़ा होना — ये काम करने वाले नेता अब विरले ही मिलते हैं।
इस युग में, जहां हर बात को ‘इवेंट’ बना दिया जाता है, डाबर जी की सादगी और सेवा हमें चुपचाप यह सिखा जाती है — कि मां भारती की सेवा करने के लिए न बड़े मंच चाहिए, न भारी भीड़। बस एक सच्चा मन चाहिए, और एक दृढ़ विचार।
सच में, वो पद से नहीं, दृष्टिकोण से मंत्री हैं।








