


कोटद्वार की सियासत की रसोई में कुछ ज़रूर पक रहा है। मसाले कुछ खास हैं, तस्वीरें चटपटी हैं और केमिस्ट्री इतनी गाढ़ी कि लोग पूछने लगे हैं—ये कौन-सी पकवान की तैयारी है?
जिस तस्वीर ने हलचल मचाई, उसमें एक तरफ़ संगठन के बेहद करीबी माने जाने वाले भाजपा जिलाध्यक्ष साहब खड़े हैं, और दूसरी ओर कांग्रेस की पूर्व प्रदेश महामंत्री महिला कांग्रेस व कोटद्वार की मेयर प्रत्याशी रह चुकीं नेत्री। मंच साझा कर रहे हैं, मुस्कान बिखेर रहे हैं, और दिलचस्प बात ये कि उसी वक़्त भाजपा का कार्यक्रम चल रहा था—शहीदों के सम्मान का। लेकिन साहब वहाँ नदारद थे।
अब इसे संयोग कहें या सियासी संकेत?
ये वही केमिस्ट्री है जिसे देखकर लोग कभी मोदी-मेलोनी को जोड़ने लगे थे, और अब कोटद्वार में लोग चुटकी लेते हैं—”कहीं कुछ नया तो नहीं पक रहा?”
बात महज़ एक मंच की नहीं है, बात है उस राजनीतिक संदेश की, जो न चाहते हुए भी इन तस्वीरों से बाहर टपक रहा है। पार्टी जहां अंदरूनी अनुशासन और विचारधारा की बात करती है, वहाँ उसका ज़िला प्रमुख एकदम उलट ध्रुव की नेता के साथ मंच साझा करता दिखे, तो सवाल उठना तो लाज़मी है।
क्या अब संगठन का मोहभंग शुरू हो चुका है?
या फिर ‘सियासी प्रयोगशाला’ में कुछ नया केमिकल रिएक्शन चल रहा है?
भाजपा के कद्दावर नेता की गैरमौजूदगी अपने ही कार्यक्रम में और वही वक्त, वही दिन, वही शहर में एक विरोधी दल की महिला नेता के साथ मंच साझा करना… ये महज़ इत्तेफाक नहीं लगते।
ये तस्वीरें कैमरा से कम, केलकुलेटर से ज़्यादा ली जाती हैं। हर मुस्कान के पीछे जोड़-घटाव होता है। हर मौजूदगी के पीछे एक सियासी स्क्रिप्ट होती है। और यहां तो स्क्रिप्ट में ट्विस्ट साफ नज़र आ रहा है।
लोग अब चर्चा करने लगे हैं कि ये मेल सिर्फ़ मंच का नहीं, मन का भी है क्या?
कहीं ऐसा तो नहीं कि 2027 की तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है? टिकट किससे लेना है, ये सोच कर ही मंच बदले जा रहे हैं?
जो भी हो, कोटद्वार की सियासत में अब हलचल है। और जैसे हर पकवान की खुशबू दूर तक जाती है, वैसे ही ये सियासी खुशबू अब लोगों की नाक में चढ़ने लगी है।
सवाल अब बस एक—क्या वाकई कुछ पक रहा है, या सिर्फ़ जनता की भूख बढ़ाई जा रही है?








