प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा: डीएम सविन बंसल की पहल से जली उम्मीदों की लौ, 56 बेटियों की शिक्षा को मिला नया जीवन

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उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में जब प्रशासनिक संवेदनशीलता और मानवीयता मिलकर काम करती है, तो उसका परिणाम “प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा” जैसे सराहनीय प्रयास के रूप में सामने आता है। ज़िला अधिकारी सविन बंसल द्वारा शुरू किया गया यह प्रोजेक्ट न केवल शिक्षा की अलख जगा रहा है, बल्कि उन बेटियों के सपनों को भी पंख दे रहा है, जिन्हें समाज ने या हालात ने लगभग भुला ही दिया था।

56 बेटियों की शिक्षा को फिर से जीवित कर देना, कोई आंकड़ा भर नहीं है—यह एक सोच है, एक संकल्प है, जो इस बात का प्रमाण है कि प्रशासन अगर चाहे तो समाज में बदलाव की असली मशाल वही बन सकता है। ज़रा सोचिए, अगर हर ज़िले में ऐसा ही एक डीएम हो, जो बच्चों के भविष्य को लेकर इस तरह का जुनून रखे, तो उत्तराखंड ही नहीं, पूरा देश शिक्षा की असली तस्वीर में रंग सकता है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के संकल्प से प्रेरित होकर चल रहा यह नवाचार अब नौवें संस्करण तक पहुंच चुका है, और खास बात ये है कि यह कोई मीडिया की टीआरपी स्टंट नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर सच्चा बदलाव है—जहां बेटियां प्रशासन को “थैंक्यू सीएम सर” कहती हैं, और वो मुस्कान दिखती है जो शायद सालों बाद लौटी हो।

अब सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ देहरादून तक ही सीमित रहेगा या फिर प्रदेश के बाकी जिलों में भी “नंदा-सुनंदा” जैसी पहल देखने को मिलेगी? क्योंकि असल विकास वहीं है, जहाँ सरकार की योजनाएं कागज़ से निकलकर उन चेहरों तक पहुंचें, जो अब तक सिर्फ किताबों के सपनों में कॉलेज देखा करते थे।

व्यंग्यात्मक तौर पर कहें तो, जब बड़े-बड़े मंत्रालय “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” के पोस्टर छपवाने में करोड़ों बहा रहे हों, वहीं एक डीएम बेटियों की स्कूल फीस भरने के लिए लाखों का इंतज़ाम कर उन्हें कॉलेज के रास्ते पर खड़ा कर रहा है—बिना किसी सेल्फी, बिना किसी भाषण के।

शायद अब वक़्त आ गया है कि बदलाव का ब्रांड भी सिर्फ नेताओं से हटकर कुछ अफसरों के नाम हो जाए। क्योंकि अगर नंदा और सुनंदा जैसे प्रोजेक्ट आम हों जाएं, तो सिर्फ बेटियां नहीं, पूरा समाज शिक्षित और आत्मनिर्भर हो उठेगा।

संक्षेप में — यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं, उम्मीद की वह चिंगारी है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मशाल बन सकती है… अगर उसे बुझने ना दिया जाए।

Khushi
Author: Khushi

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