



बारिश का मौसम आते ही उत्तराखंड के शहरों की असलियत सड़क पर उतर आती है – और कोटद्वार भी इससे अछूता नहीं है। देवी रोड पर जलभराव देखकर कोई भी कह सकता है कि नगर निगम और पीडब्ल्यूडी के बीच की ट्यूनिंग वैसी ही है जैसे बिना तालीम के बैंड का सुर। जल निकासी के नाम पर योजनाएं बनती हैं, ड्रॉइंग-डिज़ाइन होती हैं, बजट पास होता है, उद्घाटन के रिबन भी कटते हैं… लेकिन पानी फिर भी वहीं खड़ा रहता है – सड़क पर, दुकानों में, और अब जनता के गले तक।
ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष और कोटद्वार की विधायक ऋतु खण्डूडी भूषण का मौके पर पहुंचना उस पुराने कहावत की याद दिलाता है – “जहाँ सिस्टम सो रहा हो, वहाँ एक जनप्रतिनिधि का जाग जाना ही बड़ी बात है।” उन्होंने न सिर्फ जलभराव देखा, बल्कि विभागों की नींद भी तोड़ी। देवी रोड की निर्माणाधीन नहर को देखकर उन्होंने जो कहा, वह दरअसल हर कोटद्वारवासी की आवाज़ है – कि ये काम समय पर क्यों नहीं होते?
निरीक्षण केवल रस्म अदायगी नहीं था, क्योंकि बालासौड़, काशीरामपुर तल्ला से लेकर कौड़ियां तक का दौरा कर उन्होंने उन गलियों में पसीना बहाया जहाँ अधिकारी अक्सर जूते गंदे होने के डर से नहीं जाते। वर्षों से बंद पड़ी नहरें और अवैध अतिक्रमण किसी रहस्य की तरह नहीं, बल्कि खुली किताब की तरह सामने थे। सवाल यह है कि अगर विधायक को दौरा करके यह सब पता चलता है, तो विभागीय अधिकारी किस मिट्टी के बने हैं?
होटल और दुकानें जब गंदा पानी खुले में बहाएं और नगर निगम आंखें मूंद ले – तब जाहिर है कि नाराज़गी तो बनती है। ऋतु खण्डूडी की चेतावनी अगर वास्तव में कार्रवाई में बदले, तो कोटद्वार की जनता कम से कम यह उम्मीद तो कर सकेगी कि अगली बारिश में उनके घर पानी में तैरते हुए न मिलें।
कोटद्वार की भौगोलिक स्थिति निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण है, लेकिन समस्या भौगोलिक से ज़्यादा ‘प्रशासनिक इच्छाशक्ति’ की है। यह पहली बारिश नहीं थी, और ना ही आखिरी। असली परीक्षा अब उस समयसीमा की है, जिस पर अक्सर सिस्टम की घड़ी ही बंद मिलती है।
एक जनप्रतिनिधि का फ़ील्ड में होना अच्छा संकेत है – लेकिन जब तक विभाग भी उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना न सीखें, तब तक जनता का “पैर जलभराव में” और “धैर्य गले तक” डूबा रहेगा।








