
देहरादून की बारिश ने इस बार प्रशासन को भी “अर्ली मॉर्निंग वॉक” करवा दी — फर्क बस इतना कि ये वॉक पार्क में नहीं, जलभराव वाली सड़कों पर हुई। जिलाधिकारी सविन बंसल सुबह-सुबह ही ग्राउंड जीरो पर उतर आए, मानो कह रहे हों, “बारिश का पानी भले घुटनों तक आ जाए, लेकिन मेरा सर्वे वहीं तक सीमित नहीं रहेगा।” कंट्रोल रूम पहुंचते ही उन्होंने कमान संभाल ली — और अधिकारियों को 24 घंटे सतर्क रहने, राहत पहुंचाने, और नदी किनारों से लोगों को दूर रखने के निर्देश दिए।
रिस्पना क्षेत्र में आपदा की आशंका देखते हुए एसडीएम कुमकुम जोशी ने होटल को राहत शिविर में बदलने का आदेश जारी कर दिया। प्रभावितों के लिए भोजन, पानी और कमरे की व्यवस्था हो गई — यानी बारिश का कहर हो तो सही, लेकिन ‘आवास सुविधा’ सरकारी पैकेज में शामिल है।
बारिश ने ब्रहमपुरी, रोहिया नगर और लक्ष्मण चौक के पास कुछ मकान गिरा दिए। सौभाग्य से कोई हताहत नहीं हुआ, लेकिन ये घटनाएं उस विकास की पोल खोल गईं, जिसमें “मजबूत इमारतें” सिर्फ सरकारी कागजों में ही खड़ी होती हैं। जगह-जगह पेड़ गिरे, और गुनियाला गांव में भूस्खलन हुआ — विभागों को कार्रवाई के निर्देश भी उतनी ही तेजी से मिले, जितनी तेजी से बरसात की धारें बह रही थीं।
आईटी पार्क और ईश्वर विहार रायपुर में फंसे लोग एसडीआरएफ और पुलिस की मदद से निकाले गए — ये वही इलाके हैं जो ‘स्मार्ट सिटी’ के गर्व में सीना ताने रहते हैं, लेकिन पहली जोरदार बारिश में ही इनके ‘स्मार्ट’ होने का सच बहकर नालों में मिल जाता है।
गणेश एन्क्लेव, किशनपुर, गुच्चुपानी, माजरा, नत्थनपुर और 91 अन्य स्थानों पर जलभराव की खबरें आईं। क्यूआरटी की टीमों ने डी-वाटरिंग शुरू कर दी — यानी बारिश का पानी निकालने के लिए उतनी ही मेहनत लगी, जितनी इसे रोकने के लिए पहले से लगनी चाहिए थी, पर नहीं लगी।
कुल मिलाकर, 12 राष्ट्रीय और 19 राज्य मार्ग खुले हैं, लेकिन 346 ग्रामीण मार्गों में से 14 बंद हैं। प्रशासन इन्हें खोलने में जुटा है — उम्मीद है कि जब तक सड़कें पूरी तरह खुलेंगी, तब तक बारिश “अगले सीजन” में शिफ्ट हो चुकी होगी।
यह सब देखकर लगता है कि देहरादून में बारिश अब सिर्फ मौसम की घटना नहीं, बल्कि वार्षिक प्रशासनिक परीक्षा है — जिसमें हर साल वही सवाल आते हैं, लेकिन कॉपी में जवाब अब भी अधूरे रहते हैं।








