
बीमा कराओ, किस्त भरो, भरोसा रखो – यही मंत्र हर बैंक ग्राहक को समझाया जाता है। लेकिन जैसे ही ऋणग्राही की साँसें थम जाती हैं, वैसे ही बैंकों का जमीर भी दम तोड़ देता है। पति की मौत के बाद विधवा माला देवी अपने दो बच्चों संग पहले ही जीवन की लड़ाई लड़ रही थीं, ऊपर से बैंक और बीमा कंपनी ने उनकी बेबसी को अपना फायदा उठाने का जरिया बना लिया। बीस लाख का लोन, बारह लाख से ज़्यादा किस्तें जमा, बीमा भी कराया – फिर भी बैंक ने वही किया जो अक्सर होता है, “प्रक्रिया में है” कहकर टालमटोल।
लेकिन इस बार मामला फंसा गलत जगह। माला देवी सीधे डीएम सविन बंसल तक पहुँचीं और वहीं बैंक की किस्मत का ताला भी बंद हो गया। एक ही मुलाक़ात में 22 लाख की आरसी कटी, शाखा सील हुई, संपत्ति कुर्क हुई और नीलामी की तारीख़ भी तय कर दी गई। यह कोई नोटिस-चेतावनी वाला धीमा प्रशासन नहीं था, बल्कि तुरप का पत्ता फेंकते हुए सीधा मात देने वाला फैसला था।
तंज यह है कि बैंकों की “प्रोफेशनलिज़्म” और “प्रोसेस” का असली चेहरा यहीं दिखता है—लोन देते वक्त मुस्कान, क्लेम चुकाते वक्त ढाई किलो का कागज़ी बोझ। जो बैंक हर ईएमआई की याद दिलाने के लिए मैसेज और कॉल से पीछा नहीं छोड़ते, वही बैंक क्लेम के समय अचानक बहरे हो जाते हैं।
व्यंग्य यह कि विधवा और उसके दो बच्चे इंसाफ़ पाने के लिए बैंक के चक्कर न काटकर, डीएम ऑफिस पहुँचे। और डीएम ने दिखा दिया कि “निर्बल का सहारा सिर्फ़ भगवान नहीं, प्रशासन भी है”। यह मामला सिर्फ़ माला देवी की जीत नहीं, बल्कि हर उस आश्रित की उम्मीद है जिसे अब तक प्रक्रियाओं के नाम पर ठगा जाता रहा।
डीएम हो तो ऐसा – जो त्वरित फैसले ले, फाइलों में न्याय को धूल न खाने दे और जनमानस को यह भरोसा दिलाए कि सिस्टम अब सिर्फ़ बैंकों और कंपनियों के लिए नहीं, बल्कि आमजन के लिए भी काम करता है। जिस दिन हर केस में ऐसी ही कार्यवाही होगी, उस दिन बैंक का डर नहीं, प्रशासन का भरोसा सबसे बड़ा सुरक्षा कवच होगा।








