
लोकतंत्र का सच यही है कि जनता तब तालियाँ बजाती है जब कोई अफसर उसके लिए खड़ा हो जाए। देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल आज उस मिसाल के तौर पर सामने आए हैं। सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण कोई नई बीमारी नहीं—यह सालों से उत्तराखंड की व्यवस्था को खोखला कर रही थी। फर्क बस इतना है कि अब जनता ने देखा कि कोई जिलाधिकारी फाइलों में धूल जमा करने के बजाय ज़मीन पर जाकर कानून की धार दिखा सकता है।
इसी कड़े और निष्पक्ष रुख के चलते भू-क़ानून अभियान उत्तराखंड (2016) के सभी कार्यकर्ताओं ने डीएम सविन बंसल का भव्य सम्मान किया। यह सिर्फ़ माला पहनाने या शॉल ओढ़ाने की रस्म नहीं थी, यह सम्मान उस ईमानदारी और जनसेवा का था, जिसकी जनता को बरसों से तलाश थी। ऐसा लगा मानो जनता ने कह दिया हो—“हमारे बीच भी ऐसे अफसर हैं जो बिना डर-भय और दबाव के सच में न्याय कर सकते हैं।”
सम्मान कार्यक्रम अपने आप में ऐतिहासिक रहा। अभियान के संस्थापक/मुख्य संयोजक शंकर सागर, सह संयोजक आनंद सिंह रावत, गढ़वाल संयोजक अशोक नेगी, कुमाऊँ संयोजक उमेद बिष्ट, महिला संयोजक धना वाल्दिया समेत कई प्रमुख सदस्य और कार्यकर्ता मौजूद रहे। कृष्णा बिजलवाण, सुभागा फरसवान, ज्योतिका पांडे, कल्पेश्वरी नेगी, देवेश्वरी गुसाई, पूजा बुढ़ाथोकी, गीता शर्मा, राजेश कुमार सहित तमाम लोग उस क्षण के गवाह बने जब जनता और अफसर एक मंच पर खड़े होकर न्याय और विकास की साझी तस्वीर पेश कर रहे थे।
उत्तराखंड की जनता ने शायद पहली बार इतने खुले दिल से किसी जिलाधिकारी की कार्यशैली को सराहा है। लोग कह रहे हैं कि सविन बंसल जैसे अधिकारी उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। देहरादून की सरहदों से निकलकर आज उनकी कार्यवाही की गूँज पूरे उत्तराखंड में सुनाई दे रही है। यह सम्मान केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक संस्कृति का है जिसे जनता पूरे प्रदेश में फैलता हुआ देखना चाहती है।
इतिहास अक्सर नेताओं की जिद और वादों से लिखा जाता है, मगर कभी-कभी कोई अफसर अपनी ईमानदारी और फैसलों से इतिहास में नाम दर्ज करा देता है। आज सविन बंसल ने वही कर दिखाया है। सवाल यह है—क्या आने वाले दिन में उत्तराखंड के दूसरे जिलाधिकारी भी यह परंपरा अपनाएँगे, या फिर जनता को फिर से किसी नए “बंसल” का इंतजार करना होगा?








