
उत्तराखंड में जब-जब जनता को लगा कि अफसरशाही सिर्फ़ फाइलों और एयरकंडीशन कमरों तक सीमित हो चुकी है, तभी-कभी कोई ऐसा अफसर सामने आ जाता है जो तस्वीर को उलटकर रख देता है। देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल इन दिनों उसी बदली हुई तस्वीर का नाम हैं।
भू-क़ानून अभियान (2016) के कार्यकर्ताओं ने डीएम को शाल, पुष्पगुच्छ और अभिनंदन पत्र भेंटकर सम्मानित किया। काग़ज़ और कपड़े से ज्यादा यह सम्मान उस भरोसे का प्रतीक था, जो आज आम लोग प्रशासन से खो चुके हैं और अब बंसल जैसे अफसरों में ढूँढ़ रहे हैं।
जनता कह रही है—इतिहास में ऐसे अफसर उँगलियों पर गिने जाते हैं। सही भी है। क्योंकि ज़्यादातर अफसर “नियम-क़ानून” का लबादा ओढ़े रहते हैं, और जनता के दुख-दर्द सुनने के बजाय उन्हें कागज़ी गोल-गोल चक्कर में उलझा देते हैं। लेकिन बंसल ने दफ़्तर के दरवाज़े “फ़रियादी” शब्द पर खोले, और वहीं से फ़र्क़ शुरू हुआ।
भिक्षावृत्ति मुक्ति अभियान से लेकर आईएसबीटी की जलभराव समस्या तक, विधवा महिला के घर को बैंक के बंधन से छुड़ाने से लेकर दशकों से संघर्ष कर रहे भूमिधारकों को न्याय दिलाने तक—सूची लंबी है। और यही वह जगह है जहाँ व्यंग्य का रंग भरना ज़रूरी है। क्योंकि बाकी अफसर भी तो यही काम कर सकते हैं। मगर वे शायद सोचते होंगे—“इतना काम करेंगे तो प्रमोशन कैसे मिलेगा? ट्रांसफ़र जल्दी हो जाएगा।”
दरअसल, बंसल का सबसे बड़ा अपराध यही है कि उन्होंने साबित कर दिया कि “अधिकारियों के पास समय नहीं है” वाली दलील एक झूठ है। अब जनता बाकी जिलों में तैनात अफसरों से भी यही उम्मीद करने लगी है। यह तो सीधे-सीधे ‘कार्यक्षैली का महाभंग’ है!
सोचिए, जब एक बुज़ुर्ग फरियादी डीएम को अपने हाथ जोड़कर धन्यवाद कहता है तो यह तमाचा सिर्फ़ एक भ्रष्ट सिस्टम पर नहीं, बल्कि उन आरामपसंद अफसरों पर भी पड़ता है जो अपनी कुर्सी पर बैठकर खुद को भगवान समझते हैं।
उत्तराखंड में अफसरों की एक लंबी परंपरा रही है—जो नियमों की आड़ में अपने काम न करने की कला को ही “कानून” बना देती है। लेकिन बंसल ने इस परंपरा को धक्का देकर दरकाया है। यही वजह है कि आज भू-क़ानून अभियान के कार्यकर्ताओं ने उन्हें सम्मानित करते हुए कहा कि—“हम इतिहास में ऐसे अधिकारियों को गिनकर देख सकते हैं।”
तंज तो यह है कि जनता आज एक अफसर के काम करने पर जश्न मना रही है। यह वैसा ही है जैसे अस्पताल में डॉक्टर ऑपरेशन सही कर दे तो लोग मिठाई बाँटें। सवाल उठता है कि क्या यह हमारी लोकतांत्रिक उम्मीदों का स्तर है, या फिर प्रशासन का असली पतन?
फिलहाल, जनता को फर्क़ नहीं पड़ता। जनता जानती है कि जब तक सविन बंसल जैसे अफसर कुर्सी पर बैठे हैं, उनकी समस्याएँ फाइलों में धूल नहीं खाएँगी। और यही जनता की असली जीत है। बाकी अफसरों के लिए संदेश साफ़ है—या तो बंसल जैसी कार्यशैली अपनाओ, या फिर जनता के व्यंग्य और तानों का शिकार बनो।
अब सवाल यह है कि उत्तराखंड में यह नई कार्य संस्कृति “संक्रमण” की तरह फैलेगी, या फिर एक ‘अपवाद’ बनकर रह जाएगी? जनता की उम्मीदें तो महामारी की तरह तेज़ी से फैल रही हैं। देखना यह है कि बाकी अफसर इन उम्मीदों के टीके से बचेंगे, या उन्हें गले लगाएँगे।








