“साखन खुर्द का श्मशान घाट—जहां विकास का मुर्दा तैर रहा है”

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सहारनपुर ज़िले का साखन खुर्द गांव। बारिश हुई और सच सामने आ गया। श्मशान घाट पानी से भरा पड़ा है। अब यहां शव नहीं, नाव तैर सकती है। गांव के लोग कहते हैं—जीते जी सुविधा नहीं मिली, मरने के बाद चिता की जगह भी पानी में डूब गई। यह दृश्य विकास के तमाम वादों की चिता है।

ज़रा सोचिए, विधायक जी चुनाव के वक्त मंच से कहते थे—“गांव में विकास की गंगा बहा देंगे।” बहा तो दी, पर श्मशान घाट में। ब्लॉक प्रमुख ने विकास योजनाओं की लंबी-चौड़ी फाइलें दिखाई थीं, लेकिन शायद उन फाइलों पर ही किसी ने श्रद्धांजलि अर्पित कर दी। और जहां तक प्रधान की बात है—उनका जवाब साफ है, “बजट आया है, आएगा, आता रहेगा…” मानो विकास कोई बस हो, जो हमेशा छूट ही जाती है।

श्मशान घाट में जलभराव सिर्फ एक तस्वीर नहीं है, यह उस सोच का प्रतीक है जहां जीते-जागते इंसानों की समस्या तो क्या, मरने के बाद भी लाश को सुविधा न मिले। विधायक जी, आप तो बड़े-बड़े पुलों और सड़कों का सपना दिखाते हैं, लेकिन गांव का श्मशान घाट तालाब बन चुका है। ब्लॉक प्रमुख महोदय, आपने पंचायत स्तर पर कितनी योजनाएं पास कीं, पर गांव वाले पूछते हैं—श्मशान घाट को तालाब बनने से रोकने के लिए कोई योजना थी क्या? और प्रधान जी, आप तो गांव के सबसे नज़दीकी जिम्मेदार हैं, मगर आपकी नज़दीकी बस चुनावी नारों तक ही सीमित रह गई।

गांव वालों की नाराज़गी जायज़ है। उनकी पीड़ा सच्ची है। क्योंकि सवाल सिर्फ चिता जलाने का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जो हर बार वादों की लकड़ी से चुनाव की आग तो जलाती है, मगर गांव के श्मशान घाट तक सूखी लकड़ी पहुंचाने में नाकाम रहती है।

असल में, साखन खुर्द का श्मशान घाट बताता है कि यहां विकास की चिता कब की जल चुकी है। फर्क बस इतना है कि उस धुएं को देखने के लिए न विधायक की आंखें खुल रही हैं, न ब्लॉक प्रमुख की, न प्रधान की।

Khushi
Author: Khushi

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