
साखन खुर्द का श्मशान घाट अब केवल मिट्टी और पानी का ढांचा नहीं रह गया, यह गांव के नेतृत्व और प्रशासन की असफलता का जीवंत प्रमाण बन गया है। भारी बारिश में जलभराव, तालाब और नाले का निकासी न होना, और श्मशान घाट तक पहुंचने वाले रास्तों का कीचड़ और पानी में डूब जाना—यह सब दर्शाता है कि विकास के दावे सिर्फ कागजों और भाषणों तक ही सीमित हैं।
जब शिवकुमार और कालूराम जैसे बुजुर्गों का अंतिम संस्कार करना पड़ता है, तो परिजन अर्थी लेकर पानी में संघर्ष करते हुए श्मशान घाट तक पहुंचते हैं। जिम्मेदार अधिकारी और स्थानीय नेतृत्व? वह कुर्सियों पर बैठे हैं, कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। जैसे उनके लिए जनता की तकलीफ केवल एक खबर का शीर्षक हो, और असली जमीनी समस्या उनकी नजरों से गुजर ही नहीं पाती।
ग्रामीणों की शिकायतें—तालाब में भरा पानी, नाले की सफाई न होना और रास्तों का बदहाल होना—यह दिखाती हैं कि शासन-प्रशासन के विकास के दावे कितने खोखले हैं। जैसे-जैसे जनता संघर्ष करती है, नेतृत्व सिर्फ दिखावे और रंगबाजी में व्यस्त रहता है।
यह पूरा मंजर यह साबित करता है कि अगर योजनाओं का असली लाभ जनता तक नहीं पहुंचे, तो वे केवल बड़बोले दावे बनकर रह जाती हैं। श्मशान घाट की यह बदहाल स्थिति सिर्फ पानी और कीचड़ की कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन पर अकर्मण्यता और दिखावटी नेतृत्व का सटीक चित्र है।
साखन खुर्द के लोग अब सवाल उठाने को मजबूर हैं—क्या हमारी समस्याओं का हल केवल घोषणा और रंगबाजी में है, या अब समय आ गया है कि जिम्मेदार जमीनी कार्रवाई करें और गांव के श्मशान घाट को सचमुच सम्मानजनक बनाएं?








