

कम उम्र का ठप्पा लगाकर विरोधियों ने सोचा था कि पुष्कर सिंह धामी बस नाम के सीएम होंगे—“सीखने-समझने” भर का वक्त काटेंगे। लेकिन धामी ने कमान संभालते ही यह साफ कर दिया कि वे सिर्फ गद्दी गर्माने नहीं आए, बल्कि पहाड़ की तकदीर और तस्वीर बदलने आए हैं।
एन.डी. तिवारी के बाद अगर किसी ने विकास की रफ्तार को रफ्तार दी है, तो वो धाकड़ धामी ही हैं। फर्क बस इतना है कि तिवारी जी के जमाने में विकास फाइलों और योजनाओं में घूमता था, जबकि धामी के दौर में वह धरातल पर उतरता दिख रहा है।
विरोधी रोज़ नई डफली बजाते हैं—कभी कहते हैं “अनुभवहीन हैं,” कभी कहते हैं “संघ के पिट्ठू हैं।” लेकिन धामी ने यह दिखा दिया कि अनुभव की उम्र नहीं, नीयत और नीति मायने रखती है। और जहां तक “संघ के पिट्ठू” होने का सवाल है, तो विरोधियों की समझ में शायद यह बात नहीं आती कि संघ और मोदी की आइडियोलॉजी पर खरा उतरना आसान काम नहीं, बल्कि लोहे के चने चबाने जैसा है।
UCC लागू करना हो या निवेश का रास्ता खोलना, धामी ने वही किया जो बड़े-बड़े नेता करने से डरते रहे। यही वजह है कि आलोचकों के पास अब एक ही हथियार बचा है—तंज कसना। लेकिन तंज से पेट्रोल पंप नहीं चलता और न ही उससे सड़कें बनती हैं।
सच यही है कि धामी ने अपनी उम्र के तकाजे को कमजोरी नहीं, ताकत बनाया है। युवा सोच, तेज फैसले और साफ नीयत—यही उनका मंत्र है। और विपक्षियों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उनका “अनुभवी” व्यंग्य, धामी के “धाकड़” कामों के आगे बौना साबित हो रहा है।
आप चाहें तो इसे राजनीति कह लीजिए, लेकिन हकीकत यही है कि पहाड़ की सियासत में धामी नाम अब सिर्फ एक चेहरा नहीं, बल्कि एक ब्रांड बन चुका है—कम उम्र, बड़ा विजन और तंजों को ठेंगा दिखाने की कला।
रिपोर्ट___हितेश त्यागी








