
रजनीश सैनी जैसे अधिकारी इस राज्य की असली रीढ़ हैं, जो बिना पक्षपात और बिना डर-धमक के ड्यूटी निभाते हैं। लेकिन जिस तरह से उन्हें केवल उनके सरनेम के आधार पर टार्गेट किया गया, यह न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि शर्मनाक भी है। यह वही मानसिकता है जिसमें इंसान को उसके काम से नहीं, बल्कि उसके खानदान और जात-पहचान से तौला जाता है। सवाल उठता है कि क्या एक पुलिस अधिकारी की ईमानदारी और सेवा का कोई मतलब नहीं, अगर वह तथाकथित “पहाड़ी” मूल का नहीं है?
यह विडंबना ही है कि जिन असामाजिक तत्वों की असलियत दो कौड़ी से भी कम है, वही सोशल मीडिया पर कैमरे ऑन करके न्याय और पहचान के ठेकेदार बनने का नाटक करते हैं। रील बनाना इनके लिए मुद्दा है, और वैमनस्य फैलाना इनका पेशा। लेकिन यह भूल जाते हैं कि वीडियो से सच्चाई नहीं बदलती और किसी को बाहरी कह देने से वह बाहरी नहीं हो जाता। हरिद्वार, देहरादून और ऊधम सिंह नगर जैसे जिलों में पीढ़ियों से बसे परिवार अगर आज भी “बाहरी” कहलाएंगे तो फिर “अपना” आखिर है किसे कहेंगे?
यह पूरा खेल केवल नफरत की राजनीति का है। समाज को बांटकर अपनी कुर्सी चमकाने की आदत इन मुट्ठी भर गुंडों को पड़ चुकी है। और अफसोस की बात यह है कि सरकार और प्रशासन का मौन इन्हें और ताकतवर बना रहा है। सवाल यही है कि अगर एक पुलिस उपनिरीक्षक को खुलेआम धमकाकर बाहर निकालने की हिम्मत दिखा सकते हैं तो आम जनता की हालत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
अब समय आ गया है कि इन ढोंगियों और नफरत के ठेकेदारों को उनके असली आईने में दिखाया जाए। मुख्यमंत्री धामी को चाहिए कि ऐसी घिनौनी हरकतों पर तुरंत और कठोर कार्रवाई हो, ताकि आने वाले दिनों में कोई और गुंडा किसी ईमानदार अफसर या आम नागरिक को उसकी पहचान के आधार पर धमकाने की हिम्मत न कर सके। रजनीश सैनी सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उन तमाम मेहनती और ईमानदार लोगों का प्रतीक हैं जिन्हें राज्य निर्माण में योगदान देने के बावजूद बाहरी कहा जाता है। यह राज्य सबका है और इसे मुट्ठीभर वैमनस्य फैलाने वालों के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता।








